27 December, 2008

विधि आयोग की अवैधानिक सोच

बबड़े दुख और शर्म की बात है कि विधि आयोग ने देश पर अंग्रेजी की गुलामी ढ़ोते रहने का फ़ैसला लिया है। उसका कहना है कि उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों में अंग्रेजी ही एकमात्र भाषा रहेगी और हिन्दी को अभी प्रवेश देना सम्भव (फ़िजिबल) नहीं है।

सही तर्क ही न्याय का आधार है। किन्तु यहाँ बड़ी असावधानी पूर्वक 'फ़िल्मी' और हास्यास्पद तर्क दिये गये हैं। नमूने देखिये-

१- कोई भी भाषा, किसी पर भी, उनकी इच्छा के विरुद्ध नहीं 'थोपी' जानी चाहिये क्योंकि यह 'काउन्टर-प्रोडक्टिव' (उत्पादन-विरुद्ध) हो सकती है।

अंग्रेजी इसका अपवाद है? क्या दूसरे देशों में उस देश की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा को सार्वजनिक कार्यों के लिये पूरे देश पर लागू नही किया गया है? और क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जिसके सभी लोग एक ही भाषा बोलते हों?

२- यदि किसी 'जज' को किसी ऐसी भाषा में न्याय सुनाने को वाध्य किया जाय जिसमें वह प्रवीण नहीं है तो उसके लिये 'न्यायपूर्वक' काम करना अत्यन्त कठिन हो जायेगा।

क्या भारत के अलावा किसी अन्य देश में गैर-अंग्रेजी भाषा में न्याय नहीं दिया जा रहा है? जिन लोगों को मोटा वेतन और सारे भत्ते सुनिश्चित किये जाते हैं और जो इतने प्रतिभाशाली होते हैं, क्या उन्हे काम लायक हिन्दी नहीं सीखने की अपेक्षा नहीं की जा सक्ती , यदि इससे जनता को सहूलियत मिलती है? क्या करोंड़ों लोग अंग्रेजी में लिखा निर्णय वचवाने और समझने के लिये दूसरों का सहारा लें, यही ठीक है? क्या यह सही है कि पक्षकारों को ही समझ न आये कि उनके केस में क्या बहस चल रही है या न्यायधीश का इस पर क्या विचार है?


जजों को अंग्रेजी 'सीखने' के लिये वाध्य किया जाना जरूरी भी नहीं है, इसके विकल्प दिये जा सकते थे-

* जिसे हिन्दी में निर्णय चाहिये वह इसका उल्लेख करके मांग करे, अन्यथा अंग्रेजी में निर्णय दिया जायेगा।

* अंग्रेजी के निर्णय के साथ हिन्दी निर्णय भी दिया जा सकता है। (गूगल ट्रान्स्लेट जब हो सकता है तो आज के जमाने में न्यायिक निर्णयों के अनुवाद के लिये साफ़्टवेयर तो और आसान होगा; और अन्त में एक व्यक्ति इसमें आवश्यक संशोधन कर दे।

* इतनी व्यवस्था तो की ही जा सकती है कि जो 'जज' हिन्दी में निर्णय देना चाहे उसे हिन्दी में निर्णय देने की स्वतन्त्रता हो, बाकी अंग्रेजी में निर्णय दें।

३- प्रत्येक नागरिक और हरेक न्यायालय को यह अधिकार है कि वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये कानूनों को समझ सके ; किन्तु, इस समय, केवल अंग्रेजी ही इस शर्त को पूरा करती है।

तर्क और निष्कर्ष में कोई मेल ही नही है। क्या अंग्रेजी में लिखे नियम सभी नागरिकों को समझ में 'अपने-आप' आ जाते हैं? इसके विपरीत हिन्दी में दिये गये नियम बहुत अधिक संख्या में बहुत कम मेहनत के समझ में आ जायेगा। हिन्दी के टीवी चैनेलों एवं हिन्दी के अखबारों की लोकप्रियता इसका जीता-जागता प्रमाण है।

विधि आयोग का विचार पूर्वाग्रह से ग्रसित एक व्यक्ति के विचार मात्र हैं। यह क्षुद्र कुतर्कों पर आधारित है। यह भारत में अंग्रेजी की गुलामी को शाश्वत बनाने एवं यथास्थिति कायम रखने का नुस्खा है।

25 November, 2008

बिना इंटरनेट विकिपीडिया की सुविधा पाइए

जी हाँ, विकिपीडिया के अपार ज्ञान के भंडार से अब आफलाइन रहकर भी ज्ञानार्जन किया जा सकता है। भारत में इंटरनेट की स्थिति को देखते हुए भारत के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है।

केवल अंग्रेजी ही नहीं बल्कि सभी भाषाओं की विकिपीडिया और उसके बंधु प्रकल्पों का सारा ज्ञान विविध प्रारूपों मेंउपलब्ध है जिसे नि:शुल्क उतारकर उपयोग किया जा सकता है।

देखिये कि निम्नलिखित विकल्पों में कौन सा आपके लिए उपायुक्त है:

) नीचे के पते पर विकिमेडिया के डाउनलोड के कुछ प्रमुख विकल्प दिए गए हैं। इसे आप प्रवेशद्वार समझ सकतेहैं।
विकिपेडिया डाउनलोड का प्रवेशद्वार

) नीचे के पते पर हिन्दी हिन्दी विकिपीडिया का १९ जून २००८ वाला रूप उताकर प्रयोग किया जा सकता है। ये चूँकि एच टी एम् एल रूप में हैं इसलिए इसे किसी भी ब्राउजर (जैसे मोजिला फायरफाक्स या इंटरनेट एक्सप्लोरर) से खोला और देखा/पढा जा सकता है।

हिन्दी विकिपेडिया १९ जून २००८ (एच टी एम् एल )

इसी प्रकार १५ नवम्बर वाला हिन्दी विकी का क्ष प्रारूप में 'डम्प' यहाँ है ।


) नीचे के स्थान पर अंग्रेजी विकी का नवम्बर २००६ का रूप उतारा जा सकता है। यह भी एच
टी एम् एल रूप में हैं। पुराना है तो क्या हुआ, यह छोटे साइज का है अत: उतारने में आसान है।

नवम्बर २०० के
एच टी एम् एल पन्ने

) नीचे के पते पर जाइए। यहाँ पर २००८ की स्कूली बच्चो के हिसाब से निर्मित अंग्रेजी विकी के बारे में तथा उसे उतरने के बारे में जानकारी दी गई है।
स्कूली बच्चों के लिए विकिपेडिया


) विकिपीडिया क्ष (XML) प्रारूप में भी उपलब्ध है। इसे उतारकर देखने के लिए कई तरीके हैं जिसमे से पहला है - जिपेडिया (Zipedia) की सहायता से देखना और दूसरा है MySQL . जिपेडिया , फायरफाक्स का एक विस्तारक प्रोग्राम (ad-on) है

क्ष ल (XML) प्रारूप प्रयोग कराने का लाभ यह है कि आपको विकिपीडिया का नवीनतम रूप मिल सकेगा। किंतु उसके लिए आपको बहुत बड़ी फाइल भी उतारनी पड़ेगी ( याजीगा- बा )

) पॉकेट विकिपीडिया यहाँ से लिया जा सकता है। यह आकार में छोटा है और मस्त चलता है । यह विंडोज और लिनक्स पर चलेगा

७) कैमरा विकिपेडिया - यह विकिपीडिया का लघु रूप है; अति महत्वपूर्ण /लोकप्रिय विषयों का संग्रह ।


) इसके अतिरिक्त कुछ भाषाओं की विकिपीडिया सी डी के रूप में भी उपलब्ध है।


तो देर क्या है? उतरिये और आनंद लीजिये। हाँ , हिन्दी विकिपीडिया में कुछ लेखों का योगदान देने के बारे में सोचिये और कोशिश भी कीजिए। मिलकर हम हिन्दी में ज्ञान का विशाल भंडार तैयार कर सकते हैं और फ़िर उसका लाभ एक वृहद् रूप लेकर सबके सामने
होगा।


सन्दर्भ

8 Ways To Access Wikipedia Offline On Your PC and Mobiles


16 October, 2008

हिन्दी और स्वभाषा पर विचारोत्तेजक लेख

भारत के मैकाले-पूजकों ने हिन्दी , राजभाषा , मातृभाषा आदि के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियां फैला दी हैं . इससे आम जनता के मानस पटल पर इनके महत्व की विराट छवि बनने ही नहीं पातीइसी का परिणाम है कि राजनैतिक रूप से 'स्वतंत्र' होने के बावजूद भी किसी को यह स्पष्ट ही नहीं है कि स्व-तंत्र होता क्या है और इसका क्या महत्व है? इसस भ्रान्ति से उपजे भटकाव के सहारे भारत में गुलाम मानसिकता से ग्रस्त एक अत्यंत छोटा सा समूह अपने साथ अन्य लोगों को भी गुलाम ने रहने को विवश किए हुए है

अंतरजाल पर हिन्दी , मातृभाषा एवं राजभाषा के महत्व को प्रतिपादित करने वाले लेख यत्र-तत्र विद्यमान हैंइस विषय के महत्व के देखते हुए इससे सम्बंधित लेखों की कड़ियों संकलित किया गया है जिसे और भी आगे बढाया जायेगाआशा है इन लेखों का एकत्रीकरण अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल होगा



12 September, 2008

हिन्दी सशक्तिकरण के सरल सूत्र

हिन्दी दिवस पर हिन्दी के बारे में लोगों के विचार पढ़कर लोगों की हिन्दी से घनिष्ट सम्बन्ध साफ-साफ़ दिख रहा है। मैं भी इस अवसर पर कुछ कहना चाहूँगा:

१) इतिहास से सीखा है की उतार-चढाव होते रहते हैं ; आशा रखो, कर्मरत रहो, धीरज रखो । स्थिति बदल कर रहेगी; भारत हिन्दीमय होकर रहेगा।

२) हिन्दी को कर्ता, कर्म और करण चाहिये

हिन्दी कर्म - हिन्दी में गोष्ठियां हों; हिन्दी में विविध विषयों पर चर्चा के लिए समूह बनें; हिन्दी विकिपेडिया को समृद्ध बनाया जाय; हिन्दी चिट्ठाकारी से और अधिक लोगों को जोड़ा जाया; इसमे विषयों की विविधता और गहराई का समावेश किये जाय; अन्तरजाल को उपयोगी हिन्दी सामग्री से भर दिया जाय। हिन्दी यहाँ भी राज करे।

हिन्दी करण - हिन्दी/देवनागरी के लिये उपयोगी सॉफ्टवेयर, हिन्दी एवं देवनागरी में समर्थ टूल , मोबाइल पर हिन्दी टूल आदि

हिन्दी कर्ता - अधिकाधिक लोगों को हिन्दी से जोड़ने की जरूरत है। पत्रकार, विद्यार्थी, अध्यापक, साहित्यकार , इंजीनियर , डाक्टर , वैज्ञानिक, किसान, राजनेता सब जुडें। अपने-अपने क्षेत्र के जितने ही प्रतिभाशाली लोग हिन्दी से जुडेंगे, हिन्दी का कल्याण उतना ही अधिक सुनिश्चित होगा । हर हिन्दी-सेवी यही सोचे की हिन्दी के लिए वह क्या कर सकता है जो दूसरे नही कर सकते या नही कर पा रहे हैं। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।

३) कोई कहता है हिन्दी को सरल बनाना चाहिए; कोई कहता है हिन्दी का विकास किये जाना चाहिए; कोई कहता है हिन्दी को रोजगार की भाषा बनाना चाहिए; कोई कहता है हिन्दी को दूसरी भाषाओं के शब्द लेने से परहेज नहीं करना चाहिए; कोई कहता है हिन्दी में अच्छी किताबें आनी चाहिए । मैं कहता हूँ की हिन्दी के सशक्तीकरण (इम्पावरमेन्ट) की जरूरत है ; हिन्दी में बकी सब कुछ है या अपने-आप हो जायेगा।

४) जिस तरह आम जनता में, प्रिंट माध्यमों में, टीवी पर हिन्दी का बोलबाला है, अंतरजाल पर भी उसका राज स्थापित किया जाय।

५) ठोटे-छोटे नये कामों से हिन्दी का हित होगा। उदाहरण के लिये हिन्दी टेक्स्ट को ध्वनि में बदलने का एक प्रोग्राम लाखों भाषणों पर भरी पड़ेगा।

६) केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों पर जोर डाला जाय की वे जनसामान्य की भाषा हिन्दी को रोजगार से जोड़ने के लिए कदम उठाएं । लोग अंग्रेजी के पीछे इसलिये भाग रहे हैं क्योंकि देश्भाषा-द्रोही शडयन्त्रकारियों ने अचोटे-बड़े सभी रोजगारों पर उसका एकाधिकार बना कर रक दिया है।

७) केन्द्र सरकार के साथ-साथ हिन्दी प्रदेशों की सरकारें हिन्दी के बहुउपयोगी प्रोग्राम बनने के लिए धन उपलब्ध कराएँ। इसी तरह सरकार अंतरजाल पर हिन्दी का उपयोगी कंटेंट बढ़ने के लिए धन उपलब्ध कराये।

८) इलेक्ट्रानिक-शासन के इस युग में हमें अधिकाधिक सूचना हिन्दी एवं देसी भाषाओं में मंगनी चाहिए।

९) हिन्दी बाजार से जुड गयी है ; अब इसे बाज़ार पर पूर्ण कब्जा करने के लिए तैयार कीजिये ।

१०) हिन्दी भाषा में उसकी बोलियों के शब्द लीजिये। अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द लीजिये । इससे हिन्दी भारतीय भाषाओं के समीप जायेगी । हिन्दी की स्वीकार्यता बढेगी। देश की एकता मजबूत होंगी।

११) आवश्यक होने पर विदेशी शब्द भी लीजिये लेकिन इसे अंग्रेजी का 'डस्टबिन' मत बनने दीजिये । हिंग्लिश का हर स्तर पर विरोध होना चाहिए। भाषा-साम्राज्यवादी शक्तियां परदेके पीछे से हिग्लिश को महिमामंडित करके तिल-तिल करके हिन्दी और देसी भाषाओं को भ्रष्ट करना चाह्ती हैं। इससे अंतत: हिन्दी के सम्पूर्ण लोप का की स्थिति बना दी जायेगी।

१२) अपनी भाषा की प्रगति के बिना देश की प्रगति अधूरी है। यह कहना ग़लत है की भारत की प्रगति होने पर हिन्दी भी अपने-आप सशक्त हो जायेगी। भाषा की प्रगति से देश की प्रगति होगी और देश की प्रगति से भाषा की । इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए की भाषा और देश की प्रगति साथ-साथ हो ।

१३) हिन्दी को केवल सरकार के भरोसे छोड़ना खतरनाक होगा। हिन्दी से जब 'पब्लिक' जुड जायेगी तब इसका हित सुनिश्चित हो जाएगा। विविध क्षेत्रों के लोग हिन्दी से जुड़ें, इसका यत्न किया जाय। इससे हिन्दी में विविधता आयेगी, सृजनशीलता बढेगी, नए-नए विचार पनपेंगे, विचारों के टक्कर से व्यावहारिक विचार छानकर सामने आयेंगे।


01 September, 2008

अंतरजाल पर हिन्दी में कैरिअर मार्गदर्शन

आज जब सुबह अखबार खोला तो पता चला की ''कैरीअर दिशा'' नाम से हिन्दी में एक नया जालस्थल आरम्भहुआ है। बड़ी खुशी की बात है कि धीरे-धीरे हिन्दी में कैरिअर मार्गदर्शन का स्तर बढ़ता जा रहा है। आने वाले दिनोंमें लोग आई आई टी (जे ) , सी पी एम् टी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के बारे में उच्च कोटि की जानकारीआने की आशा की जा सकती है।


इस समय मेरी जानकारी में
कुछ कैरिअर मार्गदर्शक स्थल निम्नवत हैं:

रोजगार समाचार (हिन्दी)

योजना (हिन्दी पत्रिका)

संघ लोक सेवा आयोग (हिन्दी)

कैरिअर दिशा

कैरिअर सलाह

उचित कर्म

विजय मित्र

शिक्षा दीक्षा इन्फोर्मेशन

कैरीअर वाच

रोजगार और कैरीअर

My Own Business (Hindi)

भारत में शिक्षा सहायता


इसके अलावा लगभग सभी हिन्दी इ-पत्रों में भी रोजगार एवं कैरिअर से सम्बंधित कालम होता ही है ।


31 August, 2008

टूल बिना सब सून

किसी ने खूब कहा है की मनुष्य औजारों का उपयोग कराने वाला जानवर है। बिना उपकरणों के वह कुछ भी नहीं है ; उपकरण होने पर वह सब कुछ है। विंस्टन चर्चिल ने कभी कहा था कि हमें औजार दो और काम पूरा हो जायेगा .

किसी मौजूदा औजार को किसी अब तक अज्ञात काम के लिए प्रयोग करना भी अपने आप में रचनात्मकता है; नवाचार (इन्नोवेसन) है।

आइये हिन्दी-विकिपीडिया में अंत:निर्मित सम्पादक के एक ऐसे ही उपयोग की बात करें। यह एक ध्वन्यात्मक (फोनेटिक) लिप्यान्तरण औजार है जो रोमन की-बोर्ड के सहारे टाइप किए गए पाठ को हाथोहाथ देवनागरी में बदलता जाता है। तो क्या? बताता हूँ..

यदि आपके पास कोई ऐसा टेक्स्ट है जो अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा में है या कई लिपियों का मिश्रित रूप है और आप इन लिपियों में लिखे टेक्स्ट को प्रभावित किए बिना इसमे कुछ देवनागरी के नए टेक्स्ट डालना चाहते हैं या इसमे स्थित देवनागरी टेक्स्ट को बदलना चाहते हैं तो यह बड़े काम की चीज है। इस प्रकार यह हिन्दी में कंटेंट-सृजन के लिए बहुत उपयोगी है क्योंकि ऐसा मसाला हमको अक्सर मिल जाता है जिसका थोड़ा सा मूल्यवर्धन (वैल्यू ऐडीशन) करने से एक उपयोगी कन्टेन्ट बन जाता है।

इसका उपयोग कैसे करें? हिन्दी-विकिपीडिया के किसी पृष्ट को खोलिए और उसे एडिट कराने के लिए क्लिक कीजिए । यह सम्पादक हाजिर हो जायेगा। इसके टेक्स्ट-बॉक्स में अपना मौजूदा टेक्स्ट पेस्ट कीजिए और जहाँ-जहाँ देवनागरी टेक्स्ट डालना हो डाल दीजिये। काम पूरा करने के बाद इस टेक्स्ट को कापी कर लीजिये और अभीष्ट जगह पर चिपका दीजिये। ध्यान रखिये कि इसे विकिपीडिया में 'सेव' नहीं करना है नही तो जो पेज आपने खोला है वह बदल जायेगा और उस टोपिक का अनर्थ हो जाएगा।
जाँच के लिए यहाँ जाइए

कहने की जरूरत नहीं कि यह काम किसी अन्य संपादक से भी किया जा सकता है जो हाथोहाथ बदलाव करता है; केवल नए टाइप किऐ को देवनागरी में बदलता हो; वह नहीं जो रोमन में लिखे को
एकमुश्त देवनागरी में बदल देता हो

19 August, 2008

ज्ञान केवल अंग्रेजी की बपौती नहीं है

महाभारत के बारे में कहा जाता है कि "यद् इहास्ति तद् अन्यत्र, यद् इहास्ति तद् क्वचिद" (जो यहाँ है वह अन्यत्र हो सकता है, लेकिन जो यहाँ नहीं है वह कहीं नही है) यह बात शायद धर्म के बारे में कही गयी है। किन्तु इसी तरह का वक्तव्य कुछ लोग अंग्रेजी के बारे में भी उवाचते हुए मिल जाते हैं। ऐसे लोगों के इस भ्रम की दवा गूगल अनुवाद है। आइये देखें, कैसे ?

अधिकांश लोगों को पता होगा कि विकिपीडिया के लेख सैकड़ों भाषाओं में हैं - अंग्रेजी, जर्मन, फ़्रेंच, हिन्दी आदि। आप अपने पसन्द के किसी टापिक पर पहले अंग्रेजी में लेख देखिये। इसके बाद फ़्रेंच, जर्मन आदि में भी उस टापिक पर लेख देखिये। (इसके लिये बांये तरफ़ लिंक मिल जाते हैं।) यदि आपको इन भाषाओं में लिखा नहीं समझ आता है तो कोई बात नहीं - गूगल अनुवादक का सहारा लीजिये। इन्हे अंग्रेजी या हिन्दी में अनुवाद करके पढ़िये। गूगल अनुवादक आजकल इतना कारगर तो हो ही गया है कि विषय के औसत जानकर को सब बातें समझ में जाती हैं। इस प्रयोग से आप पायेंगे कि एक-दो भाषाओं में अवश्य ही ऐसा कुछ है जो अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं है - कभी कोई चित्र, कभी कोई उपशीर्षक, कभी कोई समीकरण, कभी कोई चार्ट, कभी प्रस्तुतीकरण की अलग शैली, कभी कोई भिन्न
दृष्टिकोण यही गूगल अनुवादक का असली योगदान है जो हमें अंग्रेजी के कुएँ से भी बाहर झांकने की सुविधा देता है।

मै इस प्रयोग का बहुतायत में प्रयोग करता रहता हूँ। हिन्दी विकिपीडिया पर लेख लिखते समय इसका भरपूर उपयोग करता
हूँ।

10 August, 2008

अथातो भ्रम जिज्ञासा

कहते हैं की दवा जितनी कड़वी होती उतना ही लाभकर। विषस्य विषमौषधम् ( विष की दवा विष ही होती है )। एक समय था जब कांग्रेस पार्टी ने स्वदेशी आन्दोलन चलाया था ; आज एक विदेशी ही उसका सिरमौर है। भारत में पितृ-पक्ष में लोग पितरों ( पूर्वज ) को श्राद्ध देते हैं; विवाहादि के समय पितरों को निमंत्रण दिया जाता है ; लेकिन उसी भारत में आज के बेटा-बहू अपने साथ अपने माँ -बाप तक को रखना नहीं चाहते। पहले कहते थे कि शिष्य पर सदा गुरु का ऋण रहता है ; आजकल के ट्यूशनखोर गुरू पहले ही भारी भरकम फीस लेकर शिष्य को कर्ज के बोझ तले दबाने में मदद कर रहे हैं।

जीवन विरोधाभासों से भरा पडा है। कई बार तर्कसम्मत न लगने वाली चीजें ही सही होती हैं। विज्ञ लोग विरोधाभासों को जानते ही नहीं , उनका भरपूर उपयोग करते हैं। आइये देखें कि श्लोकों , कविताओं एवं सूक्तियों में विरोधाभासों का चित्रण किस प्रकार किया गया है-


सिर राखे सिर जात है, सिर काटे सिर होय ।

काटे पै कदली फरै, कोटि जतन को सींच ।

लघुता से प्रभुता मिलै, प्रभुता से प्रभु दूर ।

काहे रे नलिनी तू कुम्हिलानी, तेरे हि नालि सरोवर पानी ।

जेतो नीचे ह्वै चले, तेरो ऊंचो होय ।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।

स्वयं महेश: श्वसुरो नगेश:
सखा धनेश: तनयो गणेश:।
तथापि भिक्षाटनमेव शम्भो:
बलीयसी केवलं ईश्वरेक्षा ।।

(भगवान शंकर स्वयं महेश ( महा ईश ) हैं; उनके स्वसुर नगेश (पहाड़ों के राजा, हिमालय) हैं; उनके मित्र धनेश (कुबेर) हैं और पुत्र गणेश (गणों के स्वामी) हैं। तथापि वे भीख मांगते हैं! इश्वर की इच्छा ही सबसे बलवान है। )

ब्रह्म सत्यं, जगत मिथया ( ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है; अर्थात जो दिखता है वह सत्य नहीं है, जो नहीं दिखता वही सही है।)

ज्यों-ज्यों भीगै श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होई ।
(ज्यों-ज्यों काले रंग में भीगते हैं, त्यों-त्यों साफ होते जाते हैं !!)

एक: चन्द्र: तमो हन्ति..
(एक ही चन्द्रमा अंधकार को हर लेता है, किन्तु असंखय तारागण नहीं)



इसी तरह:

दीपक की लौ बुझने से पूर्व तेज हो जाती है।

मधुरी बानी, दगाबाज की निशानी ।

अधजल गगरी छलकत जाय, भरी गगरिया चुप्पे जाय।

ज्यों खरचे, त्यों-त्यों बढ़े (विद्या)

दीपक तले अंधेरा !

गुरू गुड़, चेला चीनी ..

Anxiety rests the head that wears the crown.

संतोषं परमं सुखम् ( जिसके पास कुछ नहीं है, वही सबसे सुखी है ।)


( अथातो ब्रह्म जिज्ञासा - अर्थात अब ब्रह्म विषयक जिज्ञासा आरम्भ होती हैयह वेदान्त दर्शन या ब्रह्म सूत्र का आरंभिक सूत्र है। )

19 July, 2008

भाषा-विविधता के लिए गूगल का योगदान

गूगल अब विभिन्न भाषाओं के १५०० से अधिक उत्पाद तक बना चुका है यह गूगल की लोकप्रियता का जीवंत प्रमाण तो है ही , यूनिकोड की बढी हुई उपयोगिता को भी सिद्ध करने के लिए काफी है।


हिन्दी को भी गूगल का योगदान कम नहीं है। गूगल मेल हिन्दी में है; गूगल ट्रांसलिटरेशन टूल की सहायता से रोमन-कुंजीपटल का उपयोग कारने वाले भी धड़ल्ले से हिन्दी लिख रहे हैं; गूगल अनुवादक टूल से विश्व की अनेक प्रमुख भाषाओं से सीधे हिन्दी में अनुवाद किये जा सकता है।

अंग्रेजी में गूगल के आधिकारिक चिट्ठे पर यह रपट पढिये :


Hitting 40 languages

11 July, 2008

क्या अंग्रेजी नही मरेगी?

ब्रिटिश साम्राज्य ने गुलाम बनाए देशों पर अंग्रेजी लादकर उसे फैलाने में मदद कीब्रिटेन का प्रभुत्व समाप्त होते ही दुनिया का अमेरिकी आर्थिक एवं सैनिक प्रभुत्व से सामना पडाइसके कारण विश्व में अंग्रेजी को फलने-फूलने का दोबारा मौका मिल गया। पूर्व में ब्रिटेन द्वारा गुलाम बनाये गए देश अब भी अंग्रेजी से पीछा नहीं छुडा पा रहे हैं

अंग्रेजी के भविष्य को लेकर कई विचारकों ने भविष्यवाणियां की हैं जिनके निष्कर्ष अलग-अलग हैं। किसी भाषा के तीव्र प्रसार के पीछे उसका आर्थिक एवं सामाजिक महत्व प्रमुख कारण होता है। कई विचारकों का मानना है की अंगरेजी की भांति ही कई भाषाएँ प्रतुत्व में आयीं और युद्ध, आर्थिक कारण, तकनीकी परिवर्तन, सामाजिक क्रान्ति आदि के चलते उनका दबदबा समाप्त हो गया वे ख़ुद ही मरणासन्न हो गयींअँग्रेजी का भी यही हाल होगाइसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:

) भाषायी एवं सांस्कृतिक गुलामी के विरुद्ध चेतना का विकास

)
अमेरिकी आर्थिक एवं सामरिक दबदबा कम होना

)
चीन का उदय

४) हिन्दी, स्पैनिश, अरबी आदि बोलने वालों की संख्या का बढ़ना

५)
अँग्रेजी बोलने वाले देशों की जनसंख्या में कमी

६)
विश्व में शिक्षा का प्रसार

७)
यूनिकोड का प्रादुर्भाव

८)
मशीन अनुवाद का पदार्पण

९)
विश्व की अधिकाँश भाषाओं में विकिपीडिया का आरम्भ

१०) इंटरनेट के कारण ज्ञान की सुलभता एवं आसानी से शिक्षाप्रद सामग्री का विकास

११) नयी प्रौद्योगिकी
एवं तकनीकी शिक्षा का विकास


उन्नीसवीं शताब्दी से ही यह प्रोपेगैंडा किये जा रहा है की अँग्रेजी विश्व भाषा होने जा रही हैयह अभी तक नहीं हो पाया है अंतरजाल पर भी अंगरेजी के कंटेंट का प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा हैश्री डेविड ग्रैदोल का मानना है की विश्व भाषा के रूप में अंगरेजी अपने शीर्ष पर पहुँच चुकी है और अब उसके पतन के दिन आरम्भ हो रहे हैं, वैसे ही जैसे बुझने के पहले लौ तेज हो जाती है!


सन्दर्भ :

29 June, 2008

भारत में गुलाम संस्कारों के अवशेष


१) अंग्रेजी भाषा - जिसे हम 'सुपर गुलामों' ने सिर पर बैठा रखा है। यहाँ की हर अर्ध-शिक्षित माँ यही कहते हुए सुनी जा सकती है की मेरे बेटे को तो हिन्दी की गिनती आती ही नहीं है।

२) बात-बात पर 'सर' का प्रयोग - यूरोप के किसी व्यक्ति को 'सर' कह दो तो वह आपको आँख फ़ाड़कर देखगा। भारत में हर किसी को 'सर' कह दिया जाता है। एक मानेकशा ही थे जिन्होने इन्दिरा जी को 'मेडम' कहने से मना कर दिया था।

३) कालोनी - भारत के किसी भी महानगर में हर किलोमीटर पर कोई न कोई "कालोनी" है। किसी समय यह शब्द "बाहर से आये अंग्रेज मालिकों" की बस्ती को कहते थे। हम अपने को ही गाली क्यों देना चाहते हैं?

४) गोरी चमड़ी के प्रति असहज भावना - इस पर तो कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है।

५) वंशवाद - भारत में वंसवाद अभी भी फल-फूल रहा है। यह अपने-आप में हमारी अप्रजातांत्रिक गुलामी का कारण भी है और लक्षण भी। इसी से मिलता -जुलता कुसंस्कार है किसी छोटे-मोटे नेता के आगे-पीछे सैकड़ों वाहनों की दौड़ और किसी अभिनेता/नेता/क्रिकेट स्टार के दर्शनों के लिए उमड़ने वाली भीड़ ।

६) भ्रष्टाचार - किसी भी समाज को गुलाम बनाने के लिये उसमें भ्रष्टाचार के बीज बोना सबसे कारगर तरीका माना जाता है। अंग्रेजों ने यह काम बहुत सफ़ाई के साथ किया। हम आज भी इससे निजात नहीं पा सके हैं। किसी भी समाज में भ्रष्टाचार और विकास का ३६ का आंकड़ा है। इंग्लैण्ड लौटने पर क्लाइव के विरुद्ध भ्रष्टाचार का मुकदमा चला था और उसको सजा हुई थी।

७) दिखावा और डींग हांकना - भारत में दिखावा करने के चक्कर में लोग अपना खेत-बारी, जमीन-जायजात बेच देते हैं। पर सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते कि उनके पास साधन और अर्थ की कमी है।

८) असमान स्कूली व्यवस्था - यह भी गुलामी की देन है जो अब तक बनी हुई है और अब फल-फूल रही है।

९) पुलिस से डर - विकसित देशों में लोग पुलिस को अपना हितैषी समझते हैं। ब्रिटिश काल में भारत में पुलिस अत्याचार और भ्रष्टाचार की पर्याय थी। इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है।

१०) क्रिकेट - कोई रचनात्मक काम करने की जरूरत ही क्या है? बस क्रिकेट सुनो, क्रिकेट खेलो, क्रिकेट की चर्चा करो..

११) टाई - इस गरम देश में टाई? गुलामी के संस्कार इतनी जल्दी कैसे मिट सकते हैं?

१२) 'विदेशी' का मोह -
वैश्वीकरण का आन्दोलन भी भारतीयों के 'इम्पोर्टेड' सामान के मोह को कम नही कर पाया है। आज भी किसी 'विदेशी' की कही हुई बात को यहाँ अधिक प्रामाणिक माना जाता है। हम अपने देश के सुन्दरतम स्थानों को भले ही न देख पायें , विदेश-गमन के लिए हजार बहाने निकाल लेते है। हमारे बच्चों को भारत के भूगोल का भले ही ज्ञान न हो, वे अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा का भूगोल अच्छी तरह जानते हैं।


थमते-थमते थमेंगे ये आँसू ।
रोना है ये कोई हंसना नही है।।

21 June, 2008

गुलामी के चमत्कार


गुलाम बनाना, उनका व्यापार करना (खरीद-फरोख्त) एवं उनके साथ पशुओं से भी निकृष्ट व्यवहार करना - शायद मानव इतिहास के सबसे घृणित अध्याय है। भारत भी बहुत लम्बी अवधि तक गुलामी के अभिशाप से ग्रसित रहा है। यद्यपि अब भारत में ऊपरी तौर पर (सौर संवैधानिक रूप से) गुलामी समाप्त हो गयी है, किन्तु गुलामी के दूरगामी प्रभाव अब भी मौजूद हैं। स्वाभिमान की कमी; आत्मविश्वास की कमी; हर बात के लिये दूसरों का मुँह ताकना; अपनी भाषा, वेष, खान-पान आदि के उपयोग में संकोच आदि गुलामी की ही उपज हैं।

यहाँ मैने गुलामी के बारे में कुछ महान चिन्तकों के विचार संकलित करने का प्रयास किया है। शायद इनकी अच्छी समझ से ही इनको जड़-मूल से उखाड़ने में मदद मिलेगी।

( समय पाकर मैं इनका हिन्दी रूपान्तर भी प्रस्तुत करूँगा )


1) The moment the slave resolves that he will no longer be a slave, his fetters fall. Freedom and slavery are mental states.”

-- Mahatma Gandhi quotes (Indian Philosopher, internationally esteemed for his doctrine of nonviolent protest, 1869-1948)


2) Broken bones can set, open wounds can heal, and bruises can fade. But the mental scars of slavery linger far longer.

-- Unknown


3) Slaves lose everything in their chains, even the desire of escaping from them.

-- Jean Jacques Rousseau (1712-1778) Swiss political philosopher and essayist.


4) Corrupted freemen are the worst of slaves.

-- David Garrick, Prologue to Edward Moore's Gamesters


5) The genius of any slave system is found in the dynamics which isolate slaves from each other, obscure the reality of a common condition, and make united rebellion against the oppressor inconceivable.

-- Dworkin, Andrea |


6) There is no slavery but ignorance.

-- Robert G Ingersoll


7) Slavery is the parent of ignorance, and ignorance begets a whole brood of follies and vices; and every one of these is inevitably hostile to literary culture.

-- Hinton Rowan Helper


8) The most fatal blow to progress is slavery of the intellect. The most sacred right of humanity is the right to think, and next to the right to think is the right to express that thought without fear.

-- Helen H. Gardner quotes


9) But this is slavery, not to speak one’s thought.


10) Enslave a man and you destroy his ambition, his enterprise, his capacity. In the constitution of human nature, the desire of bettering one's condition is the mainspring of effort. The first touch of slavery snaps this spring.

-- Horace Mann


11) Talk about slavery! It is not the peculiar institution of the South. It exists wherever men are bought and sold, wherever a man allows himself to be made a mere thing or a tool, and surrenders his inalienable rights of reason and conscience. Indeed, this slavery is more complete than that which enslaves the body alone... I never yet met with, or heard of, a judge who was not a slave of this kind, and so the finest and most unfailing weapon of injustice. He fetches a slightly higher price than the black men only because he is a more valuable slave.

-- Thoreau, Henry David


12) Some slaves are scoured to their work by whips, others by their restlessness and ambition.
-- Ruskin, John


13) Excessive liberty leads both nations and individuals into excessive slavery.
[Lat., Nimia libertas et populis et privatis in nimiam servitutem cadit.]
-- Cicero (Marcus Tullius Cicero) (often called "Tully" for short), De Republica (I, 44)


14) Although volume upon volume is written to prove slavery a very good thing, we never hear of the man who wishes to take the good of it by being a slave himself.

-- Abraham Lincoln


15) Whenever I hear anyone arguing for slavery, I feel a strong impulse to see it tried on him personally.

-- Lincoln, Abraham


16) The art of being a slave is to rule one's master.

-- Diogenes of Sinope


17) Good kings are slaves, and their people are free.

-- Marie Leszczynska (a/k/a Maria Karolina Leszczynska) (Leszcsinski)


18) No pope ever condemned slavery.

-- Joseph McCabe



14 May, 2008

विकिपिडिया को संवारो, हिन्दी का भविष्य संवरेगा


जरा सोचिये कि हिन्दी विकिपिडिया पर दस लाख लेख हो जांय तो क्या होगा? एक विद्यार्थी को आधुनिक से आधुनिक विषय पर जानकारी मिल जायेगी; कोई व्यक्ति किसी विषय पर पुस्तक रचना चाहेगा तो एक ही स्थान पर उसे सारी सामग्री हिन्दी में मिल जायेगी; किसी को कोई उपकरण स्वयं मरम्मत करना हो तो वह पढ़कर कर सकेगा; किसी रोग से पीड़ित व्यक्ति उस रोग से सम्बन्धित सारी जानकारी अपनी भाषा में पा जायेगा ....


कहते हैं कि दूसरे भी उसी की मदद करते हैं जो स्वयं अपनी मदद करता है। गूगल हिन्दी का अनुवादक नहीं ले आता यदि उसे हिन्दी में कोई क्रियाकलाप नहीं दिखता। इसी तरह आने वाले दिनों में (और आज भी) भाषा की शक्ति उसके विकिपीडिया पर स्थिति से नापी जायेगी।


हिन्दी विकिपीडिया पर इस समय उन्नीस हजार से अधिक लेख लिखे जा चुके हैं। यह काफी तेजी से बहुत से भाषाओं को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गयी है। किन्तु अभी भी यह लगभग पचास भाषाओं से पीछे है। हिन्दी के बोलने और समझने वालों की संख्या को देखते हुए इसका स्थान प्रथम दस भाषाओं में होना ही चाहिये।


इस देश में आई आई टी जे ई ई में ढ़ाई-तीन लाख लोग भाग्य आजमाते हैं; कैट (CAT) में भी इसी के करीब लोग भाग्य आजमाते है; इन्दौर जैसे शहर में बीस लाख लोग बसते हैं.. ऐसे में दस लाख लेखों का योगदान कितना सरल काम हो सकता है? किसी समाज की सम्पन्नता में इस बात से सीधा सम्बन्ध है कि उस समाज के लोग सार्वजनिक कार्यों के लिये कितना समय और धन देते हैं। हमारी अनेकानेक समस्याओं का कारण हमारा सार्वजनिक हित के कार्यों की अनदेखी करते हुए निजी हित को सर्वोपरि रखना ही है।


इसलिये सभी हिन्दी-प्रेमी इस बात को समझें कि केवल कविता और शेर से हिन्दी का विकास नहीं होगा; केवल ब्लाग पर किसी राजनैतिक विषय पर दस लाइन लिखने से देश का हित नहीं होगा; केवल आलोचनात्मक भाषण से कुछ नहीं होगा। हमे अपनी भाषा को सारे तरह के ज्ञान-विज्ञान से सुसज्जित करना होगा - तभी हिन्दी और हिन्दुस्तान दोनो का कल्याण सुनिश्चित होगा।


कोई सम्माजशास्त्र के उपविषयों (टापिक्स) पर लिखे, कोई मनोविज्ञान के उपविषयों पर, कोई राजनीति-शास्त्र पर, कोई अर्थशास्त्र पर, कोई वाणिजय पर, कोई कला पर, कोई इतिहास , कोई विज्ञान, कोई स्वास्थ्य, कोई प्रौद्योगिकी, कोई साहित्य आदि पर। विकिपिडिया का काम दो-चार लोगों के भरोसे नहीं हो पायेगा, इसमें लाखों नहीं तो हजारों लोगों को अवश्य जुड़ना पड़ेगा।


28 March, 2008

देवनागरी फाण्ट परिवर्तक

  • Sil Converter : कृतिदेव, शुषा इत्यादि फ़ॉन्टों को यूनिकोड में 100% शुद्धता से परिवर्तित करने वाला कन्वर्टर (SIL द्वारा विकसित)
  • TBIL Data Converter : Transliteration between data in font/ASCII/Roman format in Office documents into a Unicode form in any of 7 Microsoft-supported Indian languages
  • Unicode Converter (Online) : Convertrs Some Hindi and Other Indian language fonts into Unicode. यह फॉयरफॉक्स के एक्सटेंशन (ऐड-आन) के रूप में उपलब्ध है।
  • Hindi Lekhak 4.17 - कृतिदेव एवं चाणक्य फॉण्ट हेतु ऑनलाइन टाइपिंग औजार एवं फॉण्ट परिवर्तक

फॉण्ट परिवर्तकों के बारे में अन्य जानकारी:

16 March, 2008

हिन्दी विकिपीडिया १७००० लेखों के पार

बहुत खुशी की बात है कि कुछ अत्यन्त समर्पित हिन्दी सेवियों के जबरजस्त योगदान के फलस्वरूप हिन्दी विकिपीडिया पर लेखों की संख्या १७००० को पार कर चुकी है। इसके साथ ही मौजूद लेखों में परिवर्तन एवं परिवर्धन भी किये गये। लेखों में पहले की अपेक्षा अधिक विविधता भी आयी है।

यदि हम सभी हिन्दी चिट्ठाकार अपने-अपने रुचि और विशेषज्ञता के विषयों पर पाँच-पाँच लेखों का भी योगदान करें तो हिन्दी में ज्ञान का यह मुक्त संग्रह और भी उपयोगी हो जायेगा। यदि हम गहन विचार करें तो पाएंगे कि अन्तत: हिन्दी विकिपीडिया पर संचित ज्ञान ही शाश्वत सिद्ध होगा और इसी लिये विकिपीडिया पर योगदान का महत्व सर्वाधिक है।

अन्त में यही आग्रह है कि आप भी हिन्दी विकिपीडिया पर योगदान करें ।


12 March, 2008

टिडलीविकी और हिन्दी-जगत के लिये उसकी उपयोगिता

विकीपीडिया एक महान और मुक्तज्ञानकोष है, किन्तु उसके साथ समस्या यह है कि बिना अनतरजाल से जुड़े उसका उपयोग नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त आजकल कम्प्यूटर पर विश्वकोष आ गये हैं जिनकी उपयोगिता पुस्तक रूप में प्रिन्ट की गयी इनसाइक्लोपीडिया से कहीं बहुत अधिक है। दुर्भाग्य से अभी तक हिन्दी में आफलाइन उपयोग के लिये कोई विश्वकोष उपलब्ध नहीं है जबकि अंग्रेजी में एनकार्टा और अन्य अनेक कम्प्यूटरी विश्वकोष उपलब्ध हैं।

मेरे विचार से हिन्दी में आफलाइन उपयोग के लिये विश्वकोष की कमीम को टिडलीविकी नामक विकि पूरा कर सकती है। ऐसा इसलिये सम्भव है क्योंकि इसे आनलाइन और आफलाइन दोनो ही उपयोग किया जा सकता है। साथ ही एक विकी में समाहित लेखों को दूसरी विकी में आसानी से कापी करके बड़ा ज्ञानकोष बनाया जा सकता है। इस प्रकार बहुत से लोगों के योगदान को मिलाकर एक वृहद विश्वकोष या बहुत से लघुकोष बनाना असान काम है।

परिचय:

टिडलीविकी (Tiddlywiki) एक विकि है जो एक ही एचटीएमएल फाइल (CCS एवं जावास्क्रिप्ट सहित) में सब कुछ समेटे हुए होती है। विशेष बात यह है कि यह फाइल स्वयं सम्पादन-योग्य भी है। इस विकी को बिना अन्तरजाल से जुडे भी प्रयोग किया जा सकता है। जेरेमी रस्टन (Jeremy Ruston ) इसके रचनाकार हैं। इसे निजी नोटबुक के रूप मेंप्रयोग किया जा सकता है।

जब कोई इसे अपने कम्प्यूटर पर उतारकर (download) इसका उपयोग करता है तो यह प्रविष्ट की गयी नयी सूचना को हार्ड डिस्क पर जतन (save) कर सकती है। इसके लिये यह स्वयं अपने पुराने रूप को मिटाकर नये रूप में लिख (overwrite) लेती है।

टिडलीविकी का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसके अनेक रुपान्तर (adaptations) मौजूद हैं। इसके लिये बहुत सारे 'प्लग-इन', मैक्रो आदि उपलब्ध हैं। टिडलीविकी का 1.2.23 संस्करण आने के बाद इसका रुपान्तर बनाने के लिये इसके कोड में परिवर्तन नहीं करना पडता बल्कि यह काम 'प्लग-इन' की सहायता से किया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

१) इसे इन्स्टाल नहीं करना पडता। यह प्रमुख आपरेटिंग सिस्टम्स (विन्डोज, लिनक्स, मैकिन्टोश) पर अधिकांश आधुनिक ब्राउजरों (फायरफाक्स, इन्टरनेट इक्सप्लोरर, ओपेरा आदि) को सपोर्ट करती है। इसका आकार (साइज) छोटा है। इसलिये इसे यह निजी चल विकी (portable personal wiki.) की तरह प्रयुक्त हो सकती है।

२) छोटा आकार (साइज) - आसानी से डाउनलोड/अपलोड किया जा सकता है।

३) मुक्तस्रोत (ओपेनसोर्स) - इसको अपनी आवश्यकता के अनुसार बदलकर उपयोग में लाया जा सकता है। इसी लिये इसके अनेकों परिवर्तित रूप (adaptations) बन गये हैं।

४) परम्परागत विकियों के विपरीत, मूल टिडलीविकी पूर्णतः क्लाएंट-साइड अनुप्रयोग है, इसलिये इसपर काम करने के लिये अन्तरजाल से जुड़े होना जरूरी नहीं है। (अब टिडलीविकी के ऐसे रूपान्तर भी आ गये हैं जो सर्वर-साइड अनुप्रयोग हैं।)

५) यह हाइपरटेक्स्ट एचटीएमएल फाइल है जिसे वेबसर्वर पर पोस्ट क्या जा सकता है; इमेल से किसी दूसरे को भेजा जा सकता है; पेन-ड्राइव पर भण्डारण किया जा सकता है; इसे अपलोड करके किसी समूह में या अन्त्तरजाल पर 'शेयर' किया जा सकता है।

६) इसकी रचना इस प्रकार की गयी है कि यह रेखीय, क्रमागत या हाइरार्किकल पठन के बजाय हाइपरलिंकिङ् पर आधारित अरेखीय पठन को प्रोत्साहित करती है।

७) स्वानुकूलन : टिडलीविकी को अपनी आवश्यकता के अनुरूप बनाना बहुत आसान है। टिडलीविकी के 1.2.22 संस्करण आने के बाद इसके रुपान्तर (adaptations) बनाना अब अत्यन्त सरल हो गया है। अब कोड में परिवर्तन के बजाय यह कार्य 'प्लग-इन' बनाकर किये जाते हैं।

८) टिडलीविकी मुख्यतः लघु सामग्री (माइक्रो-कन्टेन्ट) के लिये अधिक उपयुक्त है। विशाल सामग्री के लिये यह उतनी अच्छी नहीं है।

प्रमुख उपयोग

  • किसी उत्पाद, साफ्टवेयर आदि के लिये एक बढिया मैनुअल अथवा दस्तावेज प्रबन्धक (documentation manager) की तरह
  • इसकी सहायता से बेहतरीन प्रायः पूछे गये प्रश्न ( FAQ ) बनाया जा सकता है।
  • अपना निजी विश्वकोश या डिक्शनरी बनाने के लिये भी प्रयोग कर सकते है।
  • इसको शेष-कार्य (to do list) बनाने के लिये उपयोग किया जा सकता है। ( इसके लिये हर शेष-कार्य के लिये एक टिडलर (tiddlers.) बनाया जा सकता है।)
  • कुछ लोग इसे चिट्ठा (ब्लाग ) के रूप में उपयोग करते है।
  • कुछ लोग इसे वेबसाइट के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
  • यदि आपका डेस्कटॉप छोटे-छोटे टेक्स्ट फाइलों, चेतावनियों (रिमाइंडर्स) और नोट आदि से भरा हुआ है तो यह उन्हे सरलता से और बेहतर ढंग से स्टोर कर सकता है।


उपयोगी कड़ियाँ

06 January, 2008

हे गुलाम, चिरंजीव !

कहते हैं कि खोटा सिक्का ज्यादा चलता है; अंग्रेजी इसका सबसे सटीक प्रमाण है

इस लेख में मैने अंग्रेजी की महान कमियों का संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास किया हैभारत का भी अंग्रेजी केजाल से बाहर निकलना बहुत जरूरी हैइसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिये यह संकलन किया गया है



अंग्रेजी भाषा की महान कमियाँ:
(English sucks. There's no denying it.)

) स्पेलिंग की समस्या

) उच्चारण की समस्या

) एक्सेंट की समस्या

) जितने अंग्रेज उतनी बोलियाँ (dilects)

) अंग्रेजी मुहावरों की समस्या (idioms and phrases)
एक गैर-अंग्रेजी भाषी यदि पूरी डिक्शनरी भी रट ले तो भी मुहावरों से भरी अंग्रेजी सुनकर बगली झांकने के लिए मजबूर हो सकता हैइसका कारण है कि मुहावरों का अर्थ उन शब्दों के अर्थ से कोई सम्बन्ध नहीं रखता जिनसे मिलकर वह मुहावरा बना हुआ है

) एक विचार के लिये कई शब्द, कई विचारों के लिये एक ही शब्द

7) कठिन शब्दावली की समस्या
( बेसिक इंग्लिश ,
प्लेन इंग्लिश , सिम्प्लिफ़ायड इंग्लिश )

8) कठिन ग्रामर की समस्या




अंग्रेजी स्पेलिंग के दोष

एक वर्ण, अनेक ध्वनियाँ ( उच्चारण)
on once - only - woman women worry
[wunce] [oanly] [wooman] [wimmen] [wurry]


एक ध्वनि के लिये अनेक वर्ण
peep - leap, people, here, weird, chief, police, me, ski, key;


इस कारण इंग्लिश जैसे लिखी है वैसे पढ़ी नहीं जाती और जैसे बोली जाती है वैसे लिखी नहीं जाती(या स्पेल नहींकी जाती)। अंग्रेजी को पढ़ पाने की मध्यम दर्जे की दक्षता प्राप्त करने के लिये ही लगभग ३७०० शब्दों की उटपटांग स्पेलिंग रटनी पड़ती है



अंग्रेजी स्पेलिंग के दुष्प्रभाव और हानियाँ:

) स्पेलिंग रटने में समय की बर्बादी

) डिक्शनरियों पर अनावश्यक कागज और पैसे की बर्बादी

) उच्चारण बताने के लिये अलग से व्यवस्था करनी पड़ती है; जैसे, किसी अन्य लिपि (जैसे आइ पी ) का सहारा लेना पड़ता हैकिन्तु यहाँ भी कोई मानक नहीं हैअधिकांश ब्रिटिश शब्दकोश IPA का प्रयोग करते हैं, किन्तु अमेरिकन डिक्शनिरियाँ अपने अलग ही पद्धति का अनुसरण करती हैं

) हाल ही में किये गये कुछ सर्वे और अनुसंधान यह साबित करते हैं कि अंग्रेजी स्पेलिंग की दूरूहता, यूके और यूएस में निरक्षरता का मुख्य कारण है

) दूसरे अल्फाबेट में लिखे जाने वाली भाषाओं को लिखने-पढ़ने की मूल चीजें सीखने में जितना समय लगता है , उससे लगभग तीन गुना समय उतनी ही अंग्रेजी सीखने में एक एक मध्यम बुद्धि का अंग्रेजी -भाषी बच्चे को लगाना पड़ता है। (
Seymour, British Journal of Psychology, 2003)

) पिछले पाँच दशकों में अंग्रेजी-भाषी देशों अनेक सर्वे हुए हैंइन सभी के निष्कर्ष इस से यह बात स्थापित होगयी है कि लगभग आधे अंग्रेजी-भाषी लिखने में अत्यधिक कठिनाई अनुभव करते हैंयहाँ तक कि लगभग बीस प्रतिशत अंग्रेजी-भाषी ठीक से पढ़ने में भी अक्षम हैंयह बात सन २००५ में यूके की हाउस आफ कामन्स की शिक्षा पर स्थापित एक समिति की रिपोर्ट कहती है

) एक मोटे अंदाज के अनुसार स्पेलिंग की दूरूहता के कारण केवल शिक्षा के क्षेत्र में प्रति वर्ष लगभग १०० बिलियन डालर की बर्बादी होती हैइसमें बार-बार डिक्शनरी के दर्शन की कीमत, गलत स्पेलिंग के कारण बर्बादहुए कागज की कीमत और स्पेलिंग के वजह से उत्पन्न हुई निरक्षरता की (अगण्य) कीमत शामिल नहीं है





अंग्रेजी स्पेलिंग सुधार के लिये प्रस्तावित कुछ उपाय

) शेवियन (Shavian) लिपि , क्विकस्क्रिप्ट

) फोनेटिक रोमन (Phonetic Roman)

) विस्तारित लैटिन (Extended Latin)

) देवग्रीक (Devagreek)
हाल ही में अन्तरजाल पर देवनागरी के बारे में कुछ जानकारी खोजते समय देवग्रीक नामक एक नये कांसेप्ट सेपरिचय हुआदेवग्रीक (Devagreek) , अंग्रेजी स्पेलिंग में सुधार के लिये प्रस्तावित एक वर्णमाला है जो रूप-रंगमें रोमन से मिलती-जुलती है किन्तु देवनागरी की ध्वन्यात्मक वरणमाला से अनुप्राणित है

) स्पेलिंग का सरलीकरण (simplified spelling)


इतनी कमियों के बावजूद अंग्रेजी का भारत में चलन पञ्चतंत्र की इन सूक्तियों को सार्थक सिद्ध करता है:

इह लोके हि धनिनां, परोऽपि स्वजनायते
स्वजनोपि दरिद्राणां, सर्वदा दुर्जनायते ।।

( इस संसार में पराया भी धनियों का अपना बन जाता हैदरिद्रों के स्वजन भी सदा दुर्जन जैसा व्यवहार करते हैं


पूज्यते यद् अपूज्योऽपि, यद् अगम्योऽपि गम्यते
वंद्यते यद् अवंद्योऽपि , प्रभावो धनस्य ।।

(धन का इतना प्रभाव है कि जो अपूज्य है वह भी पूजा जाता है; जिसके पास नहीं जाना चाहिये, उसके पास भीलोग जाते हैं; जो वंदना करने लायक नहीं है उसकी भी वन्दना की जाती है)




कुछ महत्वपूर्ण लिंक :

१) English sucks. There's no denying it.

२) Does English have an alphabet?

) English Spelling Reform Links

४) English spelling reform Link page

५)
The Strange English Language: Funny Things about English

६) English is very strange.

७) The strange English language