कहते हैं की दवा जितनी कड़वी होती उतना ही लाभकर। विषस्य विषमौषधम् ( विष की दवा विष ही होती है )। एक समय था जब कांग्रेस पार्टी ने स्वदेशी आन्दोलन चलाया था ; आज एक विदेशी ही उसका सिरमौर है। भारत में पितृ-पक्ष में लोग पितरों ( पूर्वज ) को श्राद्ध देते हैं; विवाहादि के समय पितरों को निमंत्रण दिया जाता है ; लेकिन उसी भारत में आज के बेटा-बहू अपने साथ अपने माँ -बाप तक को रखना नहीं चाहते। पहले कहते थे कि शिष्य पर सदा गुरु का ऋण रहता है ; आजकल के ट्यूशनखोर गुरू पहले ही भारी भरकम फीस लेकर शिष्य को कर्ज के बोझ तले दबाने में मदद कर रहे हैं।
जीवन विरोधाभासों से भरा पडा है। कई बार तर्कसम्मत न लगने वाली चीजें ही सही होती हैं। विज्ञ लोग विरोधाभासों को जानते ही नहीं , उनका भरपूर उपयोग करते हैं। आइये देखें कि श्लोकों , कविताओं एवं सूक्तियों में विरोधाभासों का चित्रण किस प्रकार किया गया है-
सिर राखे सिर जात है, सिर काटे सिर होय ।
काटे पै कदली फरै, कोटि जतन को सींच ।
लघुता से प्रभुता मिलै, प्रभुता से प्रभु दूर ।
काहे रे नलिनी तू कुम्हिलानी, तेरे हि नालि सरोवर पानी ।
जेतो नीचे ह्वै चले, तेरो ऊंचो होय ।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।
स्वयं महेश: श्वसुरो नगेश:
सखा धनेश: तनयो गणेश:।
तथापि भिक्षाटनमेव शम्भो:
बलीयसी केवलं ईश्वरेक्षा ।।
(भगवान शंकर स्वयं महेश ( महा ईश ) हैं; उनके स्वसुर नगेश (पहाड़ों के राजा, हिमालय) हैं; उनके मित्र धनेश (कुबेर) हैं और पुत्र गणेश (गणों के स्वामी) हैं। तथापि वे भीख मांगते हैं! इश्वर की इच्छा ही सबसे बलवान है। )
ब्रह्म सत्यं, जगत मिथया ( ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है; अर्थात जो दिखता है वह सत्य नहीं है, जो नहीं दिखता वही सही है।)
ज्यों-ज्यों भीगै श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होई ।
(ज्यों-ज्यों काले रंग में भीगते हैं, त्यों-त्यों साफ होते जाते हैं !!)
एक: चन्द्र: तमो हन्ति..
(एक ही चन्द्रमा अंधकार को हर लेता है, किन्तु असंखय तारागण नहीं)
इसी तरह:
दीपक की लौ बुझने से पूर्व तेज हो जाती है।
मधुरी बानी, दगाबाज की निशानी ।
अधजल गगरी छलकत जाय, भरी गगरिया चुप्पे जाय।
ज्यों खरचे, त्यों-त्यों बढ़े (विद्या)
दीपक तले अंधेरा !
गुरू गुड़, चेला चीनी ..
Anxiety rests the head that wears the crown.
संतोषं परमं सुखम् ( जिसके पास कुछ नहीं है, वही सबसे सुखी है ।)
( अथातो ब्रह्म जिज्ञासा - अर्थात अब ब्रह्म विषयक जिज्ञासा आरम्भ होती है । यह वेदान्त दर्शन या ब्रह्म सूत्र का आरंभिक सूत्र है। )
10 August, 2008
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5 comments:
नमस्कार आप का लेख मुझे बहुत पसंद आया ओर सुक्त्तिया भी बहौत पसंद आई धन्यवाद,
मे आप के बांलग से सब से नीचे लिखे गांधी जी के लिखे ...
हिन्दी हितार्थ
चुरा रहा हु, अगर आप को बुरा लगे तो मुझे बताये मे इन्हे अपने पेज से हटा दुगां, धन्यवाद
भाटिया जी,
ये विचार मेरे नहीं हैं, गांधीजी के हैं। मैने भी इन्हें 'चुराया' ही है। वैसे भी मेरा पोस्ट कोई ज्यों का त्यों कहीं किसी दूसरे नाम से भी छाप दे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी, बल्कि खुशी होगी।
विष की दवा विष ही होती है यह तो होम्योपैथिक सिद्दातं की बात हुयी :)
अच्छा कबीर जी उलटबांसियों के लिये प्रसिद्ध हैं; पर परम्परा तो बहुत पुरानी लगती है!
बहुत सुंदर विवेचन किया है आपने
कृपया इस पर भी लोगिन करें http://manoria.blogspot.com and http://kanjiswami.blog.co.in
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