20 July, 2007

भारत के सन्दर्भ में मुक्त-स्रोत साफ़्ट्वेयर

कहते हैं कि रावण की कई आकाश छूने वाली योजनाओं में से एक थी - स्वर्ग तक सीढ़ी का निर्माण । विचार यह था कि स्वर्ग प्राप्ति के लिये किसी को कठिन परिश्रम (तप) न करना पड़े।

इस विचार में प्रबन्धन का एक बहुत बड़ा गुर छिपा हुआ है - यदि किसी बड़े, जटिल और कठिन कार्य को छोटे-छोटे भागों में बांट दिया जाय और उनको करने का सही क्रम निश्चित कर दिया जाय तो वह कार्य सरल बन जाता है।


विज्ञान और तकनीकी के पिछले एक हजार वर्ष के विकास काल में भारत गुलामी झेल रहा था। इस कारण भारत की पारंपरिक उन्मुक्त वैज्ञानिक और तकनीकी सोच को ग्रहण लगा रहा। उसका आत्मविश्वास मरणासन्न अवस्था में पहुँचा दिया गया था। किसी बहुत बड़े तकनीकी प्रोजेक्ट में सफल होने की आशा तभी की जा सकती है यदि इसके पहले इससे छोटे आकार के बहुत से प्रोजेक्ट पूरे किये गयें हों; और इसी तत्व का अभाव 'कल्चरल गैप' कहलाता है।


अब मुक्त-स्रोत साफ़्ट्वेयर की बात करते हैं। मुक्त-स्रोत साफ़्टवेयरो की अवधारणा के समर्थन में इसकी मुख्यत: निम्नलिखित अच्छाइयाँ गिनाई जाती हैं:


मुक्त-स्रोत की अवधारणा साफ़्टवेयर-प्रयोक्ता को तरहतरह की आजादी देती है(इनका मुफ़्त होना उतना महत्व नहीं रखता),


इन साफ़्टवेयरों का सोर्स-कोड सर्वसुलभ होता है,


इनको प्रदान करने के बदले कोई मूल्य नहीं लिया जाता,


इनका उपयोग स्वेच्छा से किसी भी काम के लिये किया जा सकता है,


इसे किसी अन्य व्यक्ति को देने की मनाही नहीं होती,


सोर्स-कोड की खुली उपलब्धता के कारण इसमें कोई ऐसी असुरक्षा नहीं रह सकती जो प्रयोक्ता को पता न हो,


प्रोग्राम के कार्य करने के तरीके का अध्ययन करके उसे अपनी आवश्यकता और पर्यावरण के अनुरूप ढालने की आजादी,


किसी वेंडर का बन्धुआ-प्रयोक्ता न बनने की आजादी,


कम समय में विशाल प्रोग्राम बनाने की आजादी - विशाल प्रोग्राम से आरम्भ करके विशालतर प्रोग्राम बनाने की आजादी, क्योंकि शून्य से आरम्भ नहीं करना पड़ता ,


क्रमिक विकास (evolution) आसान और स्वाभाविक है, क्रान्ति कठिन है,

मुक्त-स्रोत का 'गोंद' आज का सर्वश्रेष्ठ गोंद (glue) है,


भारत की दृष्टि से साफ़्टवेयरों के सोर्स-कोड का सर्वसुलभ होना बहुत अर्थपूर्ण है। भारत को साफ़्टवेयर के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है तो मुक्त-स्रोत साफ़्टवेयरों के कन्धे पर चढ़कर ही यह उंचाई हासिल की जा सकती है। 'कल्चरल गैप' के श्राप से ग्रसित किसी भी देश के लिये शून्य से आरम्भ करके बड़ा साफ़्टवेयर बनाना अत्यंत कठिन है।


आज हमारे देश में लाखों की संख्या में छात्र प्रोग्रामिंग से अवगत हैं। किन्तु उनके सामने कोई बड़ा साफ़्टवेयर-निर्माण का लक्ष्य न होने के कारण उनकी योग्यता का समुचित उपयोग ही नहीं हो पाता। सीखने की दृष्टि से भी मुक्त-स्रोत सर्वोत्तम साधन हैं। वे साक्षात और जीवंत उदाहरण हैं। दर्जनों किताबें पढ़ने के बजाय किसी साफ़्टवेयर के कोड का अध्ययन करना और उसके कार्य करने का तरीका समझकर उस साफ़्टवेयर में अपनी आव्श्यकतानुसार कुछ जोड़ घटाकर काम बना लेना ज्यादा कारगर है।


3 comments:

Shrish said...

सही कहा अनुनाद जी, वाकई मुक्त स्रोत ज्ञान का एक खजाना है।

Sanjeeva Tiwari said...

ये तो सत्‍य है कि मुक्‍त स्‍त्रोत से प्राप्‍त साफ्टवेयरों के कोडो का अघ्‍ययन नये शोधार्थियों के तकनीकि शोधो के लिए एक सरल साधन सिद्ध हो रहा है ।

संजय बेंगाणी said...

यह एक नया कोण दिया है आपने. मुक्त कोड का अध्ययन. बहुत सही.