आजकल चतुर्दिक में किसकी चर्चा है ? कौन सबसे तेज विकास कर रहा है ? किसका विकास विकसित देशों को भयभीत कर रहा है ?
आजकल रोज भारत और चीन के तीव्र विकास और उनके भविष्य के "सुपरपावर" बनने के शुभ समाचार पढने-सुनने को मिलते रहते हैं | इससे भारत में आशा की एक नयी लहर आ गयी है | जो लोग इस देश के प्रति प्रचण्ड निराशावादी थे , वे भी पाला बदलने लगे हैं |
इसी उत्साह्पूर्ण माहौल को समझने और आपस में बाँटने के उद्देश्य से मैने एक नया चर्चा-समूह बनाया है - सशक्त भारत | आप सभी से निवेदन है कि आप भी इस पर भारत के विकास से संबन्धित समाचारों को पोस्ट करते रहें , ताकि यह् समूह भारत के विकास के समाचारों से परिपूर्ण एक सम्पूर्ण साइट बन जाय | इससे माहौल को और खुशनुमा बनाने मे मदद मिलेगी | हम सभी लोग विकास के समाचारों से अधिकाधिक अवगत रहेंगे | सूचना-सम्पन्न ही शक्ति-सम्पन्न माना जाता है | सूचना-सम्पन्नता ( किसी सिस्टम के सम्पूर्ण ज्ञान ) से उस सिस्टम के उन बिन्दुओं का पता चलता है जहाँ अधिक "लीवरेज्" मिल सकता है ( कम प्रयत्न से अधिक लाभ ) | यही तो प्रगति का "मूल-मंत्र" है | इससे हिन्दी में इस तरह की अन्य चर्चाओं को भी बढावा मिलेगा |
कौन जाने जब विकसित भारत का इतिहास लिखा जाय , तब इस चर्चा-समूह की भी चर्चा हो |
अकस्मात , स्वछन्द एवम उन्मुक्त विचारों को मूर्त रूप देना तथा उन्हे सही दिशा व गति प्रदान करना - अपनी भाषा हिन्दी में ।
06 December, 2005
30 November, 2005
क्या विश्व में हिन्दीभाषियों की संख्या सर्वाधिक है
नागरी लिपि परिषद के पत्रिका "नागरी संगम" के ताजा अंक मे एक शोधपत्र के बारे में सूचना प्रकाशित हुई है I इसके अनुसार, बोलने वालों की संख्या के आधार पर हिन्दी विश्व में प्रथम स्थान पर है I वैसे यह एक बहुत ही विवादास्पद, जटिल और अस्पष्ट विषय है तथा अलग-अलग श्रोत अलग-अलग आकडे प्रस्तुत करते रहे हैं I
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26 November, 2005
अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं ?
सबसे बडा कारण है फिल्मों का श्रव्य-दृष्य माध्यम होना । सर्वविदित है कि दृष्य माध्यम सर्वाधिक कारगर माध्यम है । श्रव्य और पाठ्य माध्यम इससे हजारो गुना कम कारगर हैं । एक मूढ मस्तिष्क भी , और यहाँ तक कि एक पशु भी, किसी दृष्य से बहुत सारी सामग्री ग्रहण कर लेता है ।दूसरा कारण है फिल्म में बहुत सी विधाओं का घालमेल या मिश्रण का होना । फिल्म में सौन्दर्य उपासकों के लिये सेक्स होता है, कला के पारखियों के लिये अभिनय मिलता है, साहित्य-प्रेमियों को रोचक संवाद सुनने को मिलता है , चोर-उचक्कों को उनके व्यवसाय के गुर प्राप्त होते हैं, महिलाओं और फैशन-परस्तों को नये-नये डिजायन के वस्त्राम्बर देखने को मिलते हैं ।
इसका एक तकनीकी कारण भी है । वैसे चल-चित्रों के आये हुए बहुत दिन हो गये , लेकिन चित्रों का चलना अब भी अधिसंख्य लोगों के लिये कौतूहल का विषय है । बहुत से लोग इस कौतूहल के वजह से भी फिल्में देखे जा रहे हैं । किसी ने खूब कहा है कि कोई आदमी किसी विचार के समर्थन में अपना प्राण भी दे सकता है बशर्ते वह विचार उसको पूरी तरह समझ मे न आया हो ।
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