22 April, 2005

आशा ही जीवन है

मानव जीवन द्वन्दों से भरा पडा है । सुख-दुख , लाभ-हानि , जय-पराजय आदि कुछ मुख्य द्वन्द हैं जो हर किसी के जीवन मे चाहे अनचाहे आते ही रहते हैं। इस संसार मे सबकी क्षमताएँ भिन्न-भिन्न और सीमित हैं । इसलिये कोइ भी अपनी सारी इच्छाएँ पूरी नही कर सकता । जैसे-जैसे हम आगे बढते हैं हमको अपनी सीमाओं का ज्ञान होने लगता है ।

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेसु कदाचन " मे कर्म और फल में एक सकारात्मक संबन्ध है , किन्तु यहां एक नकारात्मक भाव भी है । वह यह है कि केवल आपके द्वारा किया गया कर्म ही फल का निर्धारण नही करता वरन और भी अनेक कारक फल को प्रभावित करते है जिन पर आपका कोइ नियंत्रण नही है । इसीलिये मै मानता हूँ कि आशा ही जीवन है कयोंकि जीवन मे इतनी अनिश्चितताओं के बावजूद भी हर कोई आशा के सहारे ही जी रहा है । जैसे-जैसे हम सफल होते जाते है हमारी आशाओं का स्तर बढता जाता है । इसके विपरीत जैसे-जैसे हम असफल होते जाते हैं , हमारी आशाओं का स्तर स्वतः ही नीचे आता जाता है किन्तु आशाएं बिल्कुल समाप्त नही होती । और जो पूरी तरह निराश हो जाता है वह अपना जीवन ही समाप्त कर देता है ।

आशा का दूसरा पहलू भी है । बहुत से लोगों का मानना है कि आशामय दृष्टिकोण हमारी क्षमता और दक्षता को बढाता है । इससे सफलता और पास आ जाती है । इसके विपरीत निराशाग्रस्त व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक क्षमता घटती जाती है और सफलता उससे दूर भागती जाती है ।

एक और प्रकार की आशा है जिसे मैं संस्कृत के महान कवि भवभूति का आशावाद कहूंगा । इनका मानना है कि कोई भी प्रयास निरर्थक नही जाता ।

' आपका कोई न कोई समान-धर्मा अवश्य उत्पन्न होगा क्योंकि समय का कोई अन्त नही है और पृथ्वी बहुत बडी है । "

1 comment:

Pratik said...

अनुनाद जी, आप अनुगूंज समीक्षा में मुझे तो भूल ही गये ... या और कुछ?
http://www.hindiblogs.com/hindiblog/2005/04/9.html