
सबसे बडा कारण है फिल्मों का श्रव्य-दृष्य माध्यम होना । सर्वविदित है कि दृष्य माध्यम सर्वाधिक कारगर माध्यम है । श्रव्य और पाठ्य माध्यम इससे हजारो गुना कम कारगर हैं । एक मूढ मस्तिष्क भी , और यहाँ तक कि एक पशु भी, किसी दृष्य से बहुत सारी सामग्री ग्रहण कर लेता है ।
दूसरा कारण है फिल्म में बहुत सी विधाओं का घालमेल या मिश्रण का होना । फिल्म में सौन्दर्य उपासकों के लिये सेक्स होता है, कला के पारखियों के लिये अभिनय मिलता है, साहित्य-प्रेमियों को रोचक संवाद सुनने को मिलता है , चोर-उचक्कों को उनके व्यवसाय के गुर प्राप्त होते हैं, महिलाओं और फैशन-परस्तों को नये-नये डिजायन के वस्त्राम्बर देखने को मिलते हैं ।
इसका एक तकनीकी कारण भी है । वैसे चल-चित्रों के आये हुए बहुत दिन हो गये , लेकिन चित्रों का चलना अब भी अधिसंख्य लोगों के लिये कौतूहल का विषय है । बहुत से लोग इस कौतूहल के वजह से भी फिल्में देखे जा रहे हैं । किसी ने खूब कहा है कि कोई आदमी किसी विचार के समर्थन में अपना प्राण भी दे सकता है बशर्ते वह विचार उसको पूरी तरह समझ मे न आया हो ।