16 March, 2008

हिन्दी विकिपीडिया १७००० लेखों के पार

बहुत खुशी की बात है कि कुछ अत्यन्त समर्पित हिन्दी सेवियों के जबरजस्त योगदान के फलस्वरूप हिन्दी विकिपीडिया पर लेखों की संख्या १७००० को पार कर चुकी है। इसके साथ ही मौजूद लेखों में परिवर्तन एवं परिवर्धन भी किये गये। लेखों में पहले की अपेक्षा अधिक विविधता भी आयी है।

यदि हम सभी हिन्दी चिट्ठाकार अपने-अपने रुचि और विशेषज्ञता के विषयों पर पाँच-पाँच लेखों का भी योगदान करें तो हिन्दी में ज्ञान का यह मुक्त संग्रह और भी उपयोगी हो जायेगा। यदि हम गहन विचार करें तो पाएंगे कि अन्तत: हिन्दी विकिपीडिया पर संचित ज्ञान ही शाश्वत सिद्ध होगा और इसी लिये विकिपीडिया पर योगदान का महत्व सर्वाधिक है।

अन्त में यही आग्रह है कि आप भी हिन्दी विकिपीडिया पर योगदान करें ।


12 March, 2008

टिडलीविकी और हिन्दी-जगत के लिये उसकी उपयोगिता

विकीपीडिया एक महान और मुक्तज्ञानकोष है, किन्तु उसके साथ समस्या यह है कि बिना अनतरजाल से जुड़े उसका उपयोग नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त आजकल कम्प्यूटर पर विश्वकोष आ गये हैं जिनकी उपयोगिता पुस्तक रूप में प्रिन्ट की गयी इनसाइक्लोपीडिया से कहीं बहुत अधिक है। दुर्भाग्य से अभी तक हिन्दी में आफलाइन उपयोग के लिये कोई विश्वकोष उपलब्ध नहीं है जबकि अंग्रेजी में एनकार्टा और अन्य अनेक कम्प्यूटरी विश्वकोष उपलब्ध हैं।

मेरे विचार से हिन्दी में आफलाइन उपयोग के लिये विश्वकोष की कमीम को टिडलीविकी नामक विकि पूरा कर सकती है। ऐसा इसलिये सम्भव है क्योंकि इसे आनलाइन और आफलाइन दोनो ही उपयोग किया जा सकता है। साथ ही एक विकी में समाहित लेखों को दूसरी विकी में आसानी से कापी करके बड़ा ज्ञानकोष बनाया जा सकता है। इस प्रकार बहुत से लोगों के योगदान को मिलाकर एक वृहद विश्वकोष या बहुत से लघुकोष बनाना असान काम है।

परिचय:

टिडलीविकी (Tiddlywiki) एक विकि है जो एक ही एचटीएमएल फाइल (CCS एवं जावास्क्रिप्ट सहित) में सब कुछ समेटे हुए होती है। विशेष बात यह है कि यह फाइल स्वयं सम्पादन-योग्य भी है। इस विकी को बिना अन्तरजाल से जुडे भी प्रयोग किया जा सकता है। जेरेमी रस्टन (Jeremy Ruston ) इसके रचनाकार हैं। इसे निजी नोटबुक के रूप मेंप्रयोग किया जा सकता है।

जब कोई इसे अपने कम्प्यूटर पर उतारकर (download) इसका उपयोग करता है तो यह प्रविष्ट की गयी नयी सूचना को हार्ड डिस्क पर जतन (save) कर सकती है। इसके लिये यह स्वयं अपने पुराने रूप को मिटाकर नये रूप में लिख (overwrite) लेती है।

टिडलीविकी का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसके अनेक रुपान्तर (adaptations) मौजूद हैं। इसके लिये बहुत सारे 'प्लग-इन', मैक्रो आदि उपलब्ध हैं। टिडलीविकी का 1.2.23 संस्करण आने के बाद इसका रुपान्तर बनाने के लिये इसके कोड में परिवर्तन नहीं करना पडता बल्कि यह काम 'प्लग-इन' की सहायता से किया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

१) इसे इन्स्टाल नहीं करना पडता। यह प्रमुख आपरेटिंग सिस्टम्स (विन्डोज, लिनक्स, मैकिन्टोश) पर अधिकांश आधुनिक ब्राउजरों (फायरफाक्स, इन्टरनेट इक्सप्लोरर, ओपेरा आदि) को सपोर्ट करती है। इसका आकार (साइज) छोटा है। इसलिये इसे यह निजी चल विकी (portable personal wiki.) की तरह प्रयुक्त हो सकती है।

२) छोटा आकार (साइज) - आसानी से डाउनलोड/अपलोड किया जा सकता है।

३) मुक्तस्रोत (ओपेनसोर्स) - इसको अपनी आवश्यकता के अनुसार बदलकर उपयोग में लाया जा सकता है। इसी लिये इसके अनेकों परिवर्तित रूप (adaptations) बन गये हैं।

४) परम्परागत विकियों के विपरीत, मूल टिडलीविकी पूर्णतः क्लाएंट-साइड अनुप्रयोग है, इसलिये इसपर काम करने के लिये अन्तरजाल से जुड़े होना जरूरी नहीं है। (अब टिडलीविकी के ऐसे रूपान्तर भी आ गये हैं जो सर्वर-साइड अनुप्रयोग हैं।)

५) यह हाइपरटेक्स्ट एचटीएमएल फाइल है जिसे वेबसर्वर पर पोस्ट क्या जा सकता है; इमेल से किसी दूसरे को भेजा जा सकता है; पेन-ड्राइव पर भण्डारण किया जा सकता है; इसे अपलोड करके किसी समूह में या अन्त्तरजाल पर 'शेयर' किया जा सकता है।

६) इसकी रचना इस प्रकार की गयी है कि यह रेखीय, क्रमागत या हाइरार्किकल पठन के बजाय हाइपरलिंकिङ् पर आधारित अरेखीय पठन को प्रोत्साहित करती है।

७) स्वानुकूलन : टिडलीविकी को अपनी आवश्यकता के अनुरूप बनाना बहुत आसान है। टिडलीविकी के 1.2.22 संस्करण आने के बाद इसके रुपान्तर (adaptations) बनाना अब अत्यन्त सरल हो गया है। अब कोड में परिवर्तन के बजाय यह कार्य 'प्लग-इन' बनाकर किये जाते हैं।

८) टिडलीविकी मुख्यतः लघु सामग्री (माइक्रो-कन्टेन्ट) के लिये अधिक उपयुक्त है। विशाल सामग्री के लिये यह उतनी अच्छी नहीं है।

प्रमुख उपयोग

  • किसी उत्पाद, साफ्टवेयर आदि के लिये एक बढिया मैनुअल अथवा दस्तावेज प्रबन्धक (documentation manager) की तरह
  • इसकी सहायता से बेहतरीन प्रायः पूछे गये प्रश्न ( FAQ ) बनाया जा सकता है।
  • अपना निजी विश्वकोश या डिक्शनरी बनाने के लिये भी प्रयोग कर सकते है।
  • इसको शेष-कार्य (to do list) बनाने के लिये उपयोग किया जा सकता है। ( इसके लिये हर शेष-कार्य के लिये एक टिडलर (tiddlers.) बनाया जा सकता है।)
  • कुछ लोग इसे चिट्ठा (ब्लाग ) के रूप में उपयोग करते है।
  • कुछ लोग इसे वेबसाइट के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
  • यदि आपका डेस्कटॉप छोटे-छोटे टेक्स्ट फाइलों, चेतावनियों (रिमाइंडर्स) और नोट आदि से भरा हुआ है तो यह उन्हे सरलता से और बेहतर ढंग से स्टोर कर सकता है।


उपयोगी कड़ियाँ

06 January, 2008

हे गुलाम, चिरंजीव !

कहते हैं कि खोटा सिक्का ज्यादा चलता है; अंग्रेजी इसका सबसे सटीक प्रमाण है।

इस लेख में मैने अंग्रेजी की महान कमियों का संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास किया है। भारत का भी अंग्रेजी केजाल से बाहर निकलना बहुत जरूरी है। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिये यह संकलन किया गया है।



अंग्रेजी भाषा की महान कमियाँ:
(English sucks. There's no denying it.)

१) स्पेलिंग की समस्या

२) उच्चारण की समस्या

३) एक्सेंट की समस्या

४) जितने अंग्रेज उतनी बोलियाँ (dilects)

५) अंग्रेजी मुहावरों की समस्या (idioms and phrases)
एक गैर-अंग्रेजी भाषी यदि पूरी डिक्शनरी भी रट ले तो भी मुहावरों से भरी अंग्रेजी सुनकर बगली झांकने के लिए मजबूर हो सकता है। इसका कारण है कि मुहावरों का अर्थ उन शब्दों के अर्थ से कोई सम्बन्ध नहीं रखता जिनसे मिलकर वह मुहावरा बना हुआ है।

६) एक विचार के लिये कई शब्द, कई विचारों के लिये एक ही शब्द

7) कठिन शब्दावली की समस्या
( बेसिक इंग्लिश ,
प्लेन इंग्लिश , सिम्प्लिफ़ायड इंग्लिश )

8) कठिन ग्रामर की समस्या




अंग्रेजी स्पेलिंग के दोष

एक वर्ण, अनेक ध्वनियाँ ( उच्चारण)
on – once - only - woman – women – worry
[wunce] [oanly] [wooman] [wimmen] [wurry]


एक ध्वनि के लिये अनेक वर्ण
peep - leap, people, here, weird, chief, police, me, ski, key;


इस कारण इंग्लिश जैसे लिखी है वैसे पढ़ी नहीं जाती और जैसे बोली जाती है वैसे लिखी नहीं जाती(या स्पेल नहींकी जाती)। अंग्रेजी को पढ़ पाने की मध्यम दर्जे की दक्षता प्राप्त करने के लिये ही लगभग ३७०० शब्दों की उटपटांग स्पेलिंग रटनी पड़ती है।



अंग्रेजी स्पेलिंग के दुष्प्रभाव और हानियाँ:

१) स्पेलिंग रटने में समय की बर्बादी

२) डिक्शनरियों पर अनावश्यक कागज और पैसे की बर्बादी

३) उच्चारण बताने के लिये अलग से व्यवस्था करनी पड़ती है; जैसे, किसी अन्य लिपि (जैसे आइ पी ए) का सहारा लेना पड़ता है। किन्तु यहाँ भी कोई मानक नहीं है। अधिकांश ब्रिटिश शब्दकोश IPA का प्रयोग करते हैं, किन्तु अमेरिकन डिक्शनिरियाँ अपने अलग ही पद्धति का अनुसरण करती हैं।

४) हाल ही में किये गये कुछ सर्वे और अनुसंधान यह साबित करते हैं कि अंग्रेजी स्पेलिंग की दूरूहता, यूके और यूएसए में निरक्षरता का मुख्य कारण है।

५) दूसरे अल्फाबेट में लिखे जाने वाली भाषाओं को लिखने-पढ़ने की मूल चीजें सीखने में जितना समय लगता है , उससे लगभग तीन गुना समय उतनी ही अंग्रेजी सीखने में एक एक मध्यम बुद्धि का अंग्रेजी -भाषी बच्चे को लगाना पड़ता है। (
Seymour, British Journal of Psychology, 2003)

६) पिछले पाँच दशकों में अंग्रेजी-भाषी देशों अनेक सर्वे हुए हैं। इन सभी के निष्कर्ष इस से यह बात स्थापित होगयी है कि लगभग आधे अंग्रेजी-भाषी लिखने में अत्यधिक कठिनाई अनुभव करते हैं। यहाँ तक कि लगभग बीस प्रतिशत अंग्रेजी-भाषी ठीक से पढ़ने में भी अक्षम हैं। यह बात सन २००५ में यूके की हाउस आफ कामन्स की शिक्षा पर स्थापित एक समिति की रिपोर्ट कहती है।

७) एक मोटे अंदाज के अनुसार स्पेलिंग की दूरूहता के कारण केवल शिक्षा के क्षेत्र में प्रति वर्ष लगभग १०० बिलियन डालर की बर्बादी होती है। इसमें बार-बार डिक्शनरी के दर्शन की कीमत, गलत स्पेलिंग के कारण बर्बादहुए कागज की कीमत और स्पेलिंग के वजह से उत्पन्न हुई निरक्षरता की (अगण्य) कीमत शामिल नहीं है।





अंग्रेजी स्पेलिंग सुधार के लिये प्रस्तावित कुछ उपाय

१) शेवियन (Shavian) लिपि , क्विकस्क्रिप्ट

२) फोनेटिक रोमन (Phonetic Roman)

३) विस्तारित लैटिन (Extended Latin)

४) देवग्रीक (Devagreek)
हाल ही में अन्तरजाल पर देवनागरी के बारे में कुछ जानकारी खोजते समय देवग्रीक नामक एक नये कांसेप्ट सेपरिचय हुआ। देवग्रीक (Devagreek) , अंग्रेजी स्पेलिंग में सुधार के लिये प्रस्तावित एक वर्णमाला है जो रूप-रंगमें रोमन से मिलती-जुलती है किन्तु देवनागरी की ध्वन्यात्मक वरणमाला से अनुप्राणित है।

५) स्पेलिंग का सरलीकरण (simplified spelling)


इतनी कमियों के बावजूद अंग्रेजी का भारत में चलन पञ्चतंत्र की इन सूक्तियों को सार्थक सिद्ध करता है:

इह लोके हि धनिनां, परोऽपि स्वजनायते ।
स्वजनोपि दरिद्राणां, सर्वदा दुर्जनायते ।।

( इस संसार में पराया भी धनियों का अपना बन जाता है। दरिद्रों के स्वजन भी सदा दुर्जन जैसा व्यवहार करते हैं।


पूज्यते यद् अपूज्योऽपि, यद् अगम्योऽपि गम्यते ।
वंद्यते यद् अवंद्योऽपि , स प्रभावो धनस्य च ।।

(धन का इतना प्रभाव है कि जो अपूज्य है वह भी पूजा जाता है; जिसके पास नहीं जाना चाहिये, उसके पास भीलोग जाते हैं; जो वंदना करने लायक नहीं है उसकी भी वन्दना की जाती है)




कुछ महत्वपूर्ण लिंक :

१) English sucks. There's no denying it.

२) Does English have an alphabet?

३) English Spelling Reform Links

४) English spelling reform Link page

५)
The Strange English Language: Funny Things about English

६) English is very strange.

७) The strange English language