हिन्दी दिवस पर हिन्दी के बारे में लोगों के विचार पढ़कर लोगों की हिन्दी से घनिष्ट सम्बन्ध साफ-साफ़ दिख रहा है। मैं भी इस अवसर पर कुछ कहना चाहूँगा:
१) इतिहास से सीखा है की उतार-चढाव होते रहते हैं ; आशा रखो, कर्मरत रहो, धीरज रखो । स्थिति बदल कर रहेगी; भारत हिन्दीमय होकर रहेगा।
२) हिन्दी को कर्ता, कर्म और करण चाहिये ।
हिन्दी कर्म - हिन्दी में गोष्ठियां हों; हिन्दी में विविध विषयों पर चर्चा के लिए समूह बनें; हिन्दी विकिपेडिया को समृद्ध बनाया जाय; हिन्दी चिट्ठाकारी से और अधिक लोगों को जोड़ा जाया; इसमे विषयों की विविधता और गहराई का समावेश किये जाय; अन्तरजाल को उपयोगी हिन्दी सामग्री से भर दिया जाय। हिन्दी यहाँ भी राज करे।
हिन्दी करण - हिन्दी/देवनागरी के लिये उपयोगी सॉफ्टवेयर, हिन्दी एवं देवनागरी में समर्थ टूल , मोबाइल पर हिन्दी टूल आदि
हिन्दी कर्ता - अधिकाधिक लोगों को हिन्दी से जोड़ने की जरूरत है। पत्रकार, विद्यार्थी, अध्यापक, साहित्यकार , इंजीनियर , डाक्टर , वैज्ञानिक, किसान, राजनेता सब जुडें। अपने-अपने क्षेत्र के जितने ही प्रतिभाशाली लोग हिन्दी से जुडेंगे, हिन्दी का कल्याण उतना ही अधिक सुनिश्चित होगा । हर हिन्दी-सेवी यही सोचे की हिन्दी के लिए वह क्या कर सकता है जो दूसरे नही कर सकते या नही कर पा रहे हैं। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।
३) कोई कहता है हिन्दी को सरल बनाना चाहिए; कोई कहता है हिन्दी का विकास किये जाना चाहिए; कोई कहता है हिन्दी को रोजगार की भाषा बनाना चाहिए; कोई कहता है हिन्दी को दूसरी भाषाओं के शब्द लेने से परहेज नहीं करना चाहिए; कोई कहता है हिन्दी में अच्छी किताबें आनी चाहिए । मैं कहता हूँ की हिन्दी के सशक्तीकरण (इम्पावरमेन्ट) की जरूरत है ; हिन्दी में बकी सब कुछ है या अपने-आप हो जायेगा।
४) जिस तरह आम जनता में, प्रिंट माध्यमों में, टीवी पर हिन्दी का बोलबाला है, अंतरजाल पर भी उसका राज स्थापित किया जाय।
५) ठोटे-छोटे नये कामों से हिन्दी का हित होगा। उदाहरण के लिये हिन्दी टेक्स्ट को ध्वनि में बदलने का एक प्रोग्राम लाखों भाषणों पर भरी पड़ेगा।
६) केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों पर जोर डाला जाय की वे जनसामान्य की भाषा हिन्दी को रोजगार से जोड़ने के लिए कदम उठाएं । लोग अंग्रेजी के पीछे इसलिये भाग रहे हैं क्योंकि देश्भाषा-द्रोही शडयन्त्रकारियों ने अचोटे-बड़े सभी रोजगारों पर उसका एकाधिकार बना कर रक दिया है।
७) केन्द्र सरकार के साथ-साथ हिन्दी प्रदेशों की सरकारें हिन्दी के बहुउपयोगी प्रोग्राम बनने के लिए धन उपलब्ध कराएँ। इसी तरह सरकार अंतरजाल पर हिन्दी का उपयोगी कंटेंट बढ़ने के लिए धन उपलब्ध कराये।
८) इलेक्ट्रानिक-शासन के इस युग में हमें अधिकाधिक सूचना हिन्दी एवं देसी भाषाओं में मंगनी चाहिए।
९) हिन्दी बाजार से जुड गयी है ; अब इसे बाज़ार पर पूर्ण कब्जा करने के लिए तैयार कीजिये ।
१०) हिन्दी भाषा में उसकी बोलियों के शब्द लीजिये। अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द लीजिये । इससे हिन्दी भारतीय भाषाओं के समीप जायेगी । हिन्दी की स्वीकार्यता बढेगी। देश की एकता मजबूत होंगी।
११) आवश्यक होने पर विदेशी शब्द भी लीजिये लेकिन इसे अंग्रेजी का 'डस्टबिन' मत बनने दीजिये । हिंग्लिश का हर स्तर पर विरोध होना चाहिए। भाषा-साम्राज्यवादी शक्तियां परदेके पीछे से हिग्लिश को महिमामंडित करके तिल-तिल करके हिन्दी और देसी भाषाओं को भ्रष्ट करना चाह्ती हैं। इससे अंतत: हिन्दी के सम्पूर्ण लोप का की स्थिति बना दी जायेगी।
१२) अपनी भाषा की प्रगति के बिना देश की प्रगति अधूरी है। यह कहना ग़लत है की भारत की प्रगति होने पर हिन्दी भी अपने-आप सशक्त हो जायेगी। भाषा की प्रगति से देश की प्रगति होगी और देश की प्रगति से भाषा की । इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए की भाषा और देश की प्रगति साथ-साथ हो ।
१३) हिन्दी को केवल सरकार के भरोसे छोड़ना खतरनाक होगा। हिन्दी से जब 'पब्लिक' जुड जायेगी तब इसका हित सुनिश्चित हो जाएगा। विविध क्षेत्रों के लोग हिन्दी से जुड़ें, इसका यत्न किया जाय। इससे हिन्दी में विविधता आयेगी, सृजनशीलता बढेगी, नए-नए विचार पनपेंगे, विचारों के टक्कर से व्यावहारिक विचार छानकर सामने आयेंगे।
12 September, 2008
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13 comments:
हिन्दी भाषा में उसकी बोलियों के शब्द लीजिये। अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द लीजिये । इससे हिन्दी भारतीय भाषाओं के समीप जायेगी । हिन्दी की स्वीकार्यता बढेगी। देश की एकता मजबूत होंगी।
अंतर्जाल पर हिंदी कई रंग बदलती हुई ऊंचाई पर आयेगी। मेरी शुभकामनाएं।
अच्छा लिखा है आपने।
हिंदी दिवस पर मैंने भी एक पोस्ट
http://medianarad.blogspot.com/
पर डाली है। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।
सरल सूत्र, साधुवाद!!!
हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.
चक्कर यही है - सरकार भरोसे छोड़ दी गयी है हिन्दी।
आपकी बातों से सहमति है। हिन्दी का सशक्तिकरण बहुत जरूरी है। हिन्दी सशक्त होगी तो देश और देशवासी दोनों सशक्त होंगे। सच तो यह है कि भारत की अधिकांश समस्याओं का समाधान हिन्दी के सशक्तिकरण में ही निहित है। साधुवाद।
...हिन्दी भाषा में उसकी बोलियों के शब्द लीजिये। अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द लीजिये । इससे हिन्दी भारतीय भाषाओं के समीप जायेगी । हिन्दी की स्वीकार्यता बढेगी। देश की एकता मजबूत होंगी।...
आपकी यह बात बहुत गहरी है। भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरोने के लिए इसे ब्रह्म वाक्य मान कर चलना होगा। जितनी भारतीय भाषाओं का विकास देववाणी से हुआ है उनके अन्दर एकता का सूत्र पिरोती एक धारा बह रही है। उसे पकड़ने की आवश्यकता है।
आज पहली बार आपके चिठ्ठे पर आया। एक स्वार्थ लेकर। इसकी पूर्ति ९५% हो गयी है। शेष की पूर्ति आप कर ही देंगे।
इलाहाबाद की हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने ब्लॉगजगत पर दस्तक दी है। मेरी कोशिश है कि इसके विपुल हिन्दी भण्डार से आप सबको परिचित कराऊँ। इसकी सामग्री पुराने कुण्डली फॉन्ट में टाइप की हुई हैं। इसे यूनीकोड में बदलने का जुगाड़ खोजते हुए ज्ञानजी (मानसिक हलचल) के बताए अनुसार मैं यहाँ तक आ गया। आपने जो औंजार दे रखे हैं उनमें आगरा का परिवर्तक कुण्डली के निकटतम है। कुछ अक्षर छूट जा रहे हैं। फिलहाल उन्हें barahaIME में सीधे टाइप करके काम चला लूंगा। यदि आप सीधे कुण्डली को यूनीकोड में बदलने का औंजार दे दें, तो मजा आ जाय।
आपका ई-मेल नहीं मिला इसलिए धन्यवाद ज्ञापन भी यहीं कर लेता हूँ। मिल जाय तो बहुत सी अन्य बातें भी हो जाया करेंगी। आभार।
अनुनाद जी,
फाइल तैयार कर ली गयी है, लेकिन आपका ई-मेल नही मिल रहा है। hindustaniacademy@gmail.com पर अपना पता भेंजने का कष्ट करें।
हिंदी की प्रगति के लिए आपके सूत्रवाक्य हर हिंदी प्रेमी को अमल में लाने चाहिए।
कुछ बहुत अच्छे बिन्दु सुझाये हैं आपने. मेरी राये में:
- सरकार से हिन्दी का परोपकार सम्भव नही. यह उनके बस के परे है.
- हिन्दी का उथान का रास्ता सिर्फ़ बाज़ार वाद से होकर निकलता है.
- हिन्दी रोमनी करण करना अच्छा विचार नही.
- सोचिये लोग हिन्दी में सर्च कैसे करें.
- सेगमेंटेशन ऑफ़ कंटेंट.
- गूगल के साथ.
- मोबाइल के द्वारा.
मैं कहता हूँ की हिन्दी के सशक्तिकरण (इम्पावरमेन्ट) की जरूरत है ; हिन्दी में बकी सब कुछ है या अपने-आप हो जायेगा।
सही कहा आपने। हिन्दी वास्तव में हर स्थिति को झेलने में सक्षम है।
लेख व विचारधारा प्रभावशाली है, किंतु अब समय बदल गया है, आने वाले 20-25 सालो में एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा रहेगी, जिस पर एक का नहीं वरन सभी व्यक्तियों का अधिकार रहेगा, सम्भवत: इस क्रांति को रोक पाना ............!
श्याम जी,
इस तरह का भ्रम कम से कम डेढ़ सौ साल से फ़ैलाया गया है। इसलिये इस भ्रम से मुक्त होइये। इसके बजाय सत्य यह है कि बड़ी-बड़ी भाषाएँ आयीं और गयीं। अंग्रेजी के दिन भी लदेंगे क्योंकि अमेरिका के दिन लद रहे हैं। किसी समय संस्कृत थी, कभी ग्रीक थी, कभी लैटिन थी, कभी फ़ारसी थी, कभी फ़्रेंच थी, अभी अंग्रेजी है..। कल चीनी होगी, परसो हिन्दी होगी ..।
श्याम जी,
किस भाषा का वर्चस्व रहता है वो इस बात पर निर्भर करेगा की कौन सा देश सर्व शक्तिमान होगा. पिछले २०० सालो से विलायत और अमेरिका का एक छत्र राज रहा है दुनिया पर और इन दोनों देशो की भाषा अंगेजी थी. भविष्य में चीनी भाषा फैलेगी इस पर तो अब कल्पना करना ही छोड़ दीजिये क्यों की यह निश्चित है. रही बात भारत की वो इस पर निर्भर करेगा की भारत कितना आगे जाता है. लेकिन अखंड भारत में हिन्दी बढेगी इतना जरुर होगा.
आपकी बातों से सहमति!!!!
आपकी यह बात बहुत गहरी है!!!
हिन्दी बढेगी जरुर!!!!
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