19 September, 2005

अनुगूँज 14 : हिन्दी जाल जगत : आगे क्या ?




आलोक द्वारा उठाये गये इस "बोल्ड" प्रश्न की तारीफ़ से ही मैं अपनी बात प्रारम्भ करूँगा । मुझे ऐसा लगता है कि यह प्रश्न पूछना बहुत जरूरी था और अब देर हो रही थी । समय-समय पर पूछे गये ऐसे ही प्रश्न हमको भटकने से रोक सकते हैं । अतः आलोक को साधुवाद ।


आलोक के तीन प्रश्नो पर मेरे विचार , संक्षेप में :


(१) संजाल पर हिन्दी की वर्तमान स्थिति निश्चित ही हिन्दी प्रेमियों के लिये वांछनीय स्थिति नहीं है । इस स्थिति को अभी सन्तोषजनक भी नहीं कह सकते , वांछनीय स्थिति तो बहुत आगे की बात है । हाँ , स्थिति उत्साहवर्धक जरूर है ।

(२) जाल पर हिन्दी बढेगी और अधिक तेज गति से बढेगी । इसका कारण ये है कि अभी तक कम्प्यूटर पर हिन्दी का लिखना-पढना लगभग लोहे के चने चबाने जैसा था । लेकिन सरल और सर्वसुलभ औजारों के आ जाने से अब धीरे-धीरे ये बायें हाथ का खेल होता जा रहा है । जाल पर अंगरेजी जहाँ पिछले पच्चीस-तीस साल से अपनी जडें जमा रही थी , सही अर्थों में हिन्दी अभी एकाध साल पहले ही लगाया गया नया पौधा है । इसके अलावा हिन्दी की जन-शक्ति का नगण्य हिस्सा ही अभी इसमें योगदान कर पा रहा है । ये स्थिति शीघ्र बदलेगी ।


(३) संजाल पर हिन्दी का सर्वांगीण विकास होना जरूरी है , इसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता । हम सबको मिलकर "सर्वांगीण विकास" को और विस्तार से परिभाषित करना होगा । इस परिभाषा के आधार पर संजाल पर हिन्दी के विकास को दिशा देना हमारा कर्तव्य भी है , और महती आवश्यकता भी । आखिर "भटकने" और "प्रगति" में केवल दिशा का ही तो अन्तर है ।


संजाल पर हिन्दी के "सर्वांगीण विकास" के लिये क्या कुछ करना चाहिये , इस पर अगली प्रविष्टि मे अपने विचार व्यक्त करूँगा ।

1 comment:

निशांत शर्मा said...

अनुनाद जी, आपके विचारों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ। परन्तु जिस प्रकार नए पौधे को देखरेख की महती आवश्यकता होती है उसी प्रकार संजाल पर हिन्दी को अपने विकास के लिए हम सबके वैयक्तिक सहयोग की आवश्यकता है। फिर जब यह हिन्दी का विराट वृक्ष तैयार होगा तो समस्त हिन्दी प्रेमियों को इसकी घनी छाँव का आनन्द मिलेगा।

इस विषय पर मेरे विचार यहाँ देखें: http://nishants.net/hindi/wordpress/?p=4