23 April, 2010

लिपियों से सम्बन्धित विचित्र बातें

लाखों भाषाओं के काल-कवलित हो जाने के बाद भी विश्व में हजारों भाषाएँ प्रचलन में हैं। किन्तु इन्हें लिखने के लिये कोई बीस-पचीस लिपियों का ही सहारा है। लिपियों में इतनी बहुलता होने के बावजूद भी ये सभी मूलत: तीन प्रकार की हैं - चीनी, जापानी आदि चित्रलिपियाँ; लैटिन, अरबी, रूसी आदि अल्फाबेटिक लिपियाँ ; तथा देवनागरी, बांग्ला, सिंहल, थाई आदि ब्राह्मी से व्युत्पन्न लिपियाँ।

विश्व की भाषाओं में विचित्रताओं की भरमार है किन्तु लिपियों में भी कम विचित्रताएं नहीं हैं -

१) अरबी, फारसी आदि लिपियों में स्वर वर्ण ही नहीं हैं। वे केवल व्यंजन वर्णों से काम चलाने को मजबूर हैं।

२) तमिल लिपि के कवर्ग , चवर्ग आदि प्रथम पाँच वर्गों में केवल दो दो-दो अक्षर ही हैं । जैसे - कवर्ग में केवल 'क' और 'ङ' वर्ण ही हैं। ( ख, ग, घ नहीं हैं)

३) चीनी लिपि में 'वर्णों' (संकेतों) की संख्या व्यवहारत: अनन्त है। आप अन्तरजाल से 'चीनी वर्नमाला' को डाउनलोड नहीं कर सकते ; इसे याद नहीं कर सकते ; पहले से जो शब्द अस्तित्व में नहीं हैं उन्हें लिख नहीं सकते।

४) तिब्बती, बर्मी, थाई आदि लिपियों में लिखते समय दो शब्दों के बीच में जगह (स्पेस) नहीं छोड़ा जाता।

५) लैटिन लिपि में एक ही वर्ण के अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग उच्चारण हो सकते हैं (और कई वर्णों का उच्चारण एक जैसा हो सकता है)। 'सी' वर्ण का उच्चारण कहीं 'च', कहीं 'क', कहीं 'स' आदि होता है।

६) देवनागरी की वर्णमाला ( वास्तव में ब्राह्मी से उत्पन्न सभी लिपियों की वर्णमालाएँ) एक अत्यन्त तर्कपूर्ण ध्वन्यात्मक क्रम (phonetic order) में व्यवस्थित है। यह क्रम इतना तर्कपूर्ण है कि अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक संघ (IPA) ने अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला के निर्माण के लिये मामूली परिवर्तनों के साथ इसी क्रम को अंगीकार कर लिया।

७) अरबी, फारसी, उर्दू में कुछ वर्णों का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि वे शब्द के आदि में आ रहे हैं, बीच में या अन्त में।

८) अधिकांश लिपियाँ बाएँ से दायें लिखी जातीं हैं किन्तु अरबी, फारसी, उर्दू, हिब्रू आदि बाएँ-से-दाएँ लिखी जाती हैं। कुछ लिपियाँ उपर से नीचे भी लिखी जातीं हैं (जैसे चीनी)।

९) कुछ प्राचीन लिपियाँ अभी तक पढ़ी नहीं जा सकीं है, जैसे सिन्धु-घाटी की लिपि।

१०) ग्रीक, लैटिन, सिरिलिक (रूसी आदि) लिपियों में कैपिटल और स्माल लेटर अलग-अलग होते हैं। अन्य लिपियों में ऐसा नहीं होता।

इन्हें  भी देखें

भाषाओं से सम्बन्धित विचित्र बातें

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचक तथ्यों से ज्ञान बढ़ाने हेतु धन्यवाद ।

P.N. Subramanian said...

बहुत ही सुन्दर आलेख. हमारी लिपियों के लिए ब्राह्मी को ही श्रेय मिलना चाहिए. देवनागरी तो बहुत बाद की है.

हिमांशु । Himanshu said...

कुछ रोचक बातें जानने को मिलीं !
अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारी ! आभार ।

ePandit said...

बहुत ही रुचिकर बातें बताई अनुनाद जी। तमिल आदि लिपियों के सम्बंध में दूसरा बिंदु जानकर हैरानी हुई।

निपुण पाण्डेय said...

लिपियों के सन्दर्भ में रोचक तथ्य बताये हैं आपने .....
इसी विषय पर मेरे पास एक सवाल भटक रहा है इन दिनों....

यदि तमिल और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाएँ संस्कृत से ही जन्मी हैं तो इनकी लिपि अलग क्यों हुई....जबकि संस्कृत तो देवनागरी लिपि में है ! इन भाषाओँ के इतिहास पर कुछ खोजबीन कर रहा हूँ ...ब्राह्मी लिपि और देवनागरी आदि का इतिहास अगर कहीं मिल पाए तो कृपया जरूर बताएं ....:)

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ said...

ब्लाग पर आना सार्थक हुआ
काबिलेतारीफ़ प्रस्तुति
आपको बधाई
सृजन चलता रहे
साधुवाद...पुनः साधुवाद
satguru-satykikhoj.blogspot.com

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ said...

ब्लाग पर आना सार्थक हुआ
काबिलेतारीफ़ प्रस्तुति
आपको बधाई
सृजन चलता रहे
साधुवाद...पुनः साधुवाद
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ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

शानदार जानकारियाँ। आभार।
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कौन हो सकता है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

उपयोगी जानकारी दी है आपने |

थोड़ा विस्तार से लिखते तो और अच्छा रहता |

योगेन्द्र जोशी said...

अनुनादजी, ’प्रथम’ संबंधी विस्तॄत जानकारी संकलित की है आपने । बधाई है । - योगेन्द्र जोशी