22 February, 2009

कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग को बच्चों का खेल बनाइये

आज कम्प्यूटर अपने विविध रूपों में सर्वव्याप्त हो गया है। तमाम ऐसी युक्तियाँ हैं जिसमें छिपा-हुआ (इम्बेडेड) कम्प्यूटर है जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते। यह कोई अनुमान नहीं बल्कि सुनिश्चित है कि आने वाले दिनों में कम्प्यूटर की व्याप्ति और अधिक ही होने वाली है।

कम्प्यूटर छोटे-छोटे किन्तु लाखों-करोंड़ों कार्यों (इन्स्ट्रक्सन्स) को बहुत तीब्र गति से करता है। ( इस मामले में वह मानव से भिन्न है जो बड़े-बड़े कार्यों को अपेक्षाकृत धीमी गति से करने का आदी है। ) इन्हीं कार्यों को क्रमवद्ध रूप से व्यक्त करने को कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग कहते हैं।

आज हर तरह के कार्य के लिये अच्छे-से-अच्छा प्रोग्राम उपलब्ध है तो पूछा जा सकता है कि प्रोग्रामिंग की क्या आवश्यकता है?

प्रोग्रामिंग बहुत तरह की होती है , अनेक स्तरों पर की जाती है और अनेक भाषाओं में की जाती है। सी, जावा, बेसिक आदि सामान्य कम्प्यूटर भाषाओं के अलावा अनेक (अधिकांश) बड़े प्रोग्राम अपनी ही एक प्रोग्रामिंग भाषा से सुसज्जित होते हैं। इन प्रोग्रामों का पूर्ण एवं अभीष्ट उपयोग करने के लिये इन भाषाओं में प्रोग्राम बनाने पड़ सकते हैं। विन्डोज प्रोग्रामिंग, लिनक्स प्रोग्रामिंग, ओपेनआफिस के लिये मैक्रो लिखना; मैटलैब , साइलैब, मैथेमैटिका आदि का उपयोग करके अपनी समस्या का समाधान करने के लिये प्रोग्राम लिखना; किसी सी एन् सी मशीन से वांछित प्रकार का जाब करवाने के लिये प्रोग्रामिंग आदि।

प्रश्न उठता है कि कौन सी भाषा की प्रोग्रामिंग सीखी जाय, या आरम्भ कहाँ से करें? आज इतनी भाषाएँ हैं कि सभी को सीखा नहीं जा सकता। लेकिन सभी को सीखने की जरूरत भी नहीं है। आरम्भ करने के लिये प्रोग्रामिंग की आत्मा को समझना होगा। मेरे विचार से 'लूपिंग' ही प्रोग्रामिंग की आत्मा है। एक या कुछ कार्यों को एक क्रम में बार-बार करना, जब तक दी हुई शर्त पूरा होती हो - यही लूपिंग कहलाता है। बिना लूपिंग के कोई भी प्रोग्रामिंग भाषा हो ही नहीं सकती। या यों कहें कि 'लूपिंग' में ही कम्प्यूटर की शक्ति निहित है। एक भाषा में प्रोग्रामिंग सीखा व्यक्ति दूसरी भाषा में बहुत कम प्रयत्न से प्रोग्राम करना सीख सकता है। यह वैसे ही है जैसे सायकिल चलाना सीख लेने पर मोटरसायकिल चलाना सीखना बहुत असान हो जाता है।

बच्चों को कौन सी प्रोग्रामिंग भाषा सिखायें ?
इस पर बहुत से लोगों ने चिचार किया है और मैं भी संक्षेप में उन्ही के विचारों को अनुमोदित करूँगा। बेसिक (BASIC) में प्रोग्राम करना शीघ्र सीखा जा सकता है क्योंकि इसमें इसमें कुछ भी ऐसा नही आता जो शुरू में ही भ्रम (कान्फ्यूजन) पैदा कर दे। नेट पर इसका सॉफ्टवेयर मुफ्त में उपलब्ध है। दूसरी भाषा लोगो (Logo) है जिसका निर्माण ही बच्चों को प्रोग्रामिंग सिखाने के ध्येय से ही हुआ है। तीसरा प्रोग्राम 'स्क्रैच' (Scratch) है जिसे विश्वप्रसिद्ध प्रौद्योगिकी संस्थान एम् आई टी ने विकसित किया है। यह भी नि:शुल्क उपलब्ध है। यह एक तरह से ग्राफिक्स-आधारित प्रोग्रामिंग है जिससे बच्चा छवियों का एनिमेशन आदि प्रोग्राम कर सकता है। ध्यात्व्य है कि बहुत सरे नये प्रोग्राम अब ब्लाक-आधारित या ग्राफिक्स- अधारित प्रोग्रामिंग की सुविधा वाले आने लगे हैं और भविष्य में टेक्स्ट के रूप में प्रोग्राम लिखना काफी सीमित होने की सम्भावना है।

कम्प्यूटर भाषा तथा अल्गोरिद्म को अलग-अलग रखिये
कम्प्यूटर भाषा सिखाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि प्रोग्राम में मुख्यत: दो चीजें होती हैं -
) कम्प्यूटर भाषा, और
२) प्रोग्राम के द्वारा हल की जा रही समस्या के लिये प्रयोग किया गया अल्गोरिद्म ।
शुरू में कठिन कार्य करने के लिये प्रोग्राम लिखने की कोशिश करने/कराने का मतलब अल्गोरिद्म को अधिक महत्व देना है। इससे अरुचि जन्म लेती है। इसलिये ऐसे उदाहरण लेकर सीखना/सिखाना चाहिये जिसमें कम्प्यूटर भाषा के तत्वों की जानकारी मिले। इसके बाद छोटे-छोटे और सरल अल्गोरिद्म प्रयोग करने वाले उदाहरण लिये जा सकते हैं।

20 February, 2009

यूनेस्को का भाषाओं पर खतरे का मानचित्र

२१ फरवरी को अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। इसी दिन एक वर्ष से मनाया जा रहा अन्तरराष्ट्रीय भाषा-वर्ष समाप्त हो रहा है। इस अवसर पर यूनेस्को ने एक महान कार्य किया है। उन्होने विभिन्न स्तर के खतरों का सामना कर रही विश्व की भाषाओं का मानचित्र प्रकाशित किया है।

इस अवसर पर विभिन्न भाषाविदों की राय है कि अन्तरजाल एवं मोबाइल तकनीक के द्वारा अल्पसंख्यक भाषा-भाषियों को जोड़ने मे सहायता मिली है। इससे उनका अकेलापन (आइसोलेशन) का सिलसिला टूटा है जिससे भाषाओं के संरक्षण को बल मिला है ।

अंग्रेजी के अंधाधुंध उपयोग और गुलाम मानसिकता के चलते हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सभी भाषा-प्रेमियों के सामने इसका सम्यक और प्रभावी हल निकालने की चुनौती है !

16 February, 2009

चिट्ठा मिलनों की विषय-वस्तु क्या हो?

खुशी की बात है की हिन्दी के उत्साही युवक-युवतियां देश के विभिन्न भागों में ब्लाग-मिलनों का आयोजन कर रहे हैं। इनकी उपयोगिगिता में किसी को कोई संदेह नहीं है किंतु यदि इनकी विषय-वस्तु को आपस में विचार करके तैयार किया जाय तो इनकी उपयोगिता और बढ़ जायेगी।

मेरे विचार से चिट्ठा मेलों की विषय-वस्तु में इन बिन्दुओं का समावेश होना चाहिए -

) यह बताया जाय कि अब कम्प्यूटरों पर हिन्दी लिखना-पढ़ना बायें हाथ का खेल हो गया है। लोगों को हिन्दी लिखने के कुछेक प्रमुख तरीकों का प्रदर्शन करके उनके विश्वास को पुख्ता किया जाय।

) हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में बात हो। उसकी स्थिति के बारे में बात हो। चिट्ठाकारी का भी प्रदर्शन करके बताया जाय।

) हिन्दी के प्रमुख आफलाइन टूल्स और ऑनलाइन टूल्स के बारे में बताया जाय।

) हिन्दी के प्रमुख साइटों - जैसे नारद, ब्लागवाणी आदि एग्रीगेटर, हिन्दी विकिपिडिया, कविता कोश, हिन्द-युग्म, हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ आदि के बारे में एवं उनके पते बताएं जाँय।

) हिन्दी विकिपीडिया पर लिखने के लिये अनुरोध किया जाय।

) हिन्दी के चर्चा-समूहों पर चर्चा करने की सलाह दी जाय। उनके पते बताए जांय।

) यह बताया जाय कि हिन्दी में वेब-
खोज संभव है, आसान है, और बहुत उपयोगी है।

) यह बताया जाय कि अब ऐसे उपकरण उपलब्ध हैं जिनकी सहायता से एक लिपि को दूसरी लिपि में बदला जासकता है; एक फांट को दूसरे में बदला जा सकता है।

) गूगल ट्रांसलेट के बारे में बताया जाय यह बताया जाय कि यद्यपि मशीनी अनुवाद पूरी तरह से ठीक नहीं होता, फ़िर भी इतना शुद्ध होता है कि काफी हद तक अर्थ एवं आशय समझ में जाते हैं . इसलिए यह बहुत उपयोगी है और भविष्य में इससे भी अधिक उम्मीद है।

१०) हिन्दी में स्थानीकृत (लोकलाइज्ड) सोफ्टवेयरों के बारे में बताया जाया। संभव हो तो हिन्दी इंटरफेस वाले कुछ अनुप्रयोग दिखाए जांय

११) प्रमुख मुक्त-स्रोत सोफ्टवेयरों के बारे में बताया जाय।


१२) अंत में दस-पन्द्रह रूपये लेकर सबको एक सी-डी दी जाय जिसमे हिन्दी की उपयोगी सामग्री और सॉफ्टवेर हों। इसमें हिन्दी के ऑफलाइन संपादक , हिन्दी के शब्दकोश,
हिन्दी विकिपीडिया , हिन्दी के प्रमुख जालस्थलों की सूची और पते, हिन्दी इंटरफेस वाले मुफ्त सोफ्टवेयर, हिन्दी के बारे में क्या-क्यों और कैसे आदि रखी जा सकती है।

अभी तो इतना ही याद रहा है। और भाई लोग और उपयोगी बातें सुझाएँ।