16 October, 2008

हिन्दी और स्वभाषा पर विचारोत्तेजक लेख

भारत के मैकाले-पूजकों ने हिन्दी , राजभाषा , मातृभाषा आदि के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियां फैला दी हैं . इससे आम जनता के मानस पटल पर इनके महत्व की विराट छवि बनने ही नहीं पातीइसी का परिणाम है कि राजनैतिक रूप से 'स्वतंत्र' होने के बावजूद भी किसी को यह स्पष्ट ही नहीं है कि स्व-तंत्र होता क्या है और इसका क्या महत्व है? इसस भ्रान्ति से उपजे भटकाव के सहारे भारत में गुलाम मानसिकता से ग्रस्त एक अत्यंत छोटा सा समूह अपने साथ अन्य लोगों को भी गुलाम ने रहने को विवश किए हुए है

अंतरजाल पर हिन्दी , मातृभाषा एवं राजभाषा के महत्व को प्रतिपादित करने वाले लेख यत्र-तत्र विद्यमान हैंइस विषय के महत्व के देखते हुए इससे सम्बंधित लेखों की कड़ियों संकलित किया गया है जिसे और भी आगे बढाया जायेगाआशा है इन लेखों का एकत्रीकरण अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल होगा