27 December, 2008

विधि आयोग की अवैधानिक सोच

बबड़े दुख और शर्म की बात है कि विधि आयोग ने देश पर अंग्रेजी की गुलामी ढ़ोते रहने का फ़ैसला लिया है। उसका कहना है कि उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों में अंग्रेजी ही एकमात्र भाषा रहेगी और हिन्दी को अभी प्रवेश देना सम्भव (फ़िजिबल) नहीं है।

सही तर्क ही न्याय का आधार है। किन्तु यहाँ बड़ी असावधानी पूर्वक 'फ़िल्मी' और हास्यास्पद तर्क दिये गये हैं। नमूने देखिये-

१- कोई भी भाषा, किसी पर भी, उनकी इच्छा के विरुद्ध नहीं 'थोपी' जानी चाहिये क्योंकि यह 'काउन्टर-प्रोडक्टिव' (उत्पादन-विरुद्ध) हो सकती है।

अंग्रेजी इसका अपवाद है? क्या दूसरे देशों में उस देश की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा को सार्वजनिक कार्यों के लिये पूरे देश पर लागू नही किया गया है? और क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जिसके सभी लोग एक ही भाषा बोलते हों?

२- यदि किसी 'जज' को किसी ऐसी भाषा में न्याय सुनाने को वाध्य किया जाय जिसमें वह प्रवीण नहीं है तो उसके लिये 'न्यायपूर्वक' काम करना अत्यन्त कठिन हो जायेगा।

क्या भारत के अलावा किसी अन्य देश में गैर-अंग्रेजी भाषा में न्याय नहीं दिया जा रहा है? जिन लोगों को मोटा वेतन और सारे भत्ते सुनिश्चित किये जाते हैं और जो इतने प्रतिभाशाली होते हैं, क्या उन्हे काम लायक हिन्दी नहीं सीखने की अपेक्षा नहीं की जा सक्ती , यदि इससे जनता को सहूलियत मिलती है? क्या करोंड़ों लोग अंग्रेजी में लिखा निर्णय वचवाने और समझने के लिये दूसरों का सहारा लें, यही ठीक है? क्या यह सही है कि पक्षकारों को ही समझ न आये कि उनके केस में क्या बहस चल रही है या न्यायधीश का इस पर क्या विचार है?


जजों को अंग्रेजी 'सीखने' के लिये वाध्य किया जाना जरूरी भी नहीं है, इसके विकल्प दिये जा सकते थे-

* जिसे हिन्दी में निर्णय चाहिये वह इसका उल्लेख करके मांग करे, अन्यथा अंग्रेजी में निर्णय दिया जायेगा।

* अंग्रेजी के निर्णय के साथ हिन्दी निर्णय भी दिया जा सकता है। (गूगल ट्रान्स्लेट जब हो सकता है तो आज के जमाने में न्यायिक निर्णयों के अनुवाद के लिये साफ़्टवेयर तो और आसान होगा; और अन्त में एक व्यक्ति इसमें आवश्यक संशोधन कर दे।

* इतनी व्यवस्था तो की ही जा सकती है कि जो 'जज' हिन्दी में निर्णय देना चाहे उसे हिन्दी में निर्णय देने की स्वतन्त्रता हो, बाकी अंग्रेजी में निर्णय दें।

३- प्रत्येक नागरिक और हरेक न्यायालय को यह अधिकार है कि वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये कानूनों को समझ सके ; किन्तु, इस समय, केवल अंग्रेजी ही इस शर्त को पूरा करती है।

तर्क और निष्कर्ष में कोई मेल ही नही है। क्या अंग्रेजी में लिखे नियम सभी नागरिकों को समझ में 'अपने-आप' आ जाते हैं? इसके विपरीत हिन्दी में दिये गये नियम बहुत अधिक संख्या में बहुत कम मेहनत के समझ में आ जायेगा। हिन्दी के टीवी चैनेलों एवं हिन्दी के अखबारों की लोकप्रियता इसका जीता-जागता प्रमाण है।

विधि आयोग का विचार पूर्वाग्रह से ग्रसित एक व्यक्ति के विचार मात्र हैं। यह क्षुद्र कुतर्कों पर आधारित है। यह भारत में अंग्रेजी की गुलामी को शाश्वत बनाने एवं यथास्थिति कायम रखने का नुस्खा है।

13 comments:

अफ़लातून said...

विधि आयोग की उपर्युक्त सिफारिशें शर्मनाक और गुलाम मानसिकता की द्योतक हैं । सही सोच के जज राज्य की भाषाओं में फैसले दे कर नजीर प्रस्तुत करते रहे हैं - उन्हीं पर भरोसा करना होगा । वकीलों को भारतीय भाषाओं में जिरह करने के साथ साथ निर्णय भी अंग्रेजी में न देने का आग्रह करना होगा।

संजय बेंगाणी said...

आज सुबह जब यह समाचार पढ़ा तो मन शोक व दुख में डूब गया.

पंगेबाज said...

ये मानसिक रूप से अभी भी ब्रिटेन के गुलाम है . इन्हे न्याय पाने वालो से कोई लेना देना नही है सिर्फ़ न्याय करने वालो और कराने वालो के हित चिंतक है ये. अगर न्याय पाने वाले की भाषा मे सारी कार्यवाही होगी तो वह सालो तक उल्लू बन कर इन न्याय पालिकायो के भ्रष्ट लोगो के बीच अपनी मेहनत की कमाई नही लुटाता रहेगा.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

विधि आयोग का यह निर्णय शर्मनाक तो है ही। इस का विरोध होना चाहिए। आप का बहुत बहुत आभार कि आप इस मामले को प्रकाश में लाए। इस मामले पर संसद में चर्चा क्यों न हो जाए आगामी सत्र में। संसद से बड़ा तो कोई नहीं है।

ajay kumar jha said...

main khud adaalat mein hee kaaryarat hoon aur yatha sambhav kaam bhee hindi mein hee kartaa hoon kintu aapko bata doon ki dilli kee jila adaalat mein shaayad main aisaa karne walaa akelaa hoon jiskaa mujhe garv hai.

'Yuva' said...

काफी संजीदगी से आप अपने ब्लॉग पर विचारों को रखते हैं.यहाँ पर आकर अच्छा लगा. कभी मेरे ब्लॉग पर भी आयें. ''युवा'' ब्लॉग युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अभिव्यक्तियों को सार्थक रूप देने के लिए है. यह ब्लॉग सभी के लिए खुला है. यदि आप भी इस ब्लॉग पर अपनी युवा-अभिव्यक्तियों को प्रकाशित करना चाहते हैं, तो amitky86@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं. आपकी अभिव्यक्तियाँ कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, वैचारिकी, चित्र इत्यादि किसी भी रूप में हो सकती हैं......नव-वर्ष-२००९ की शुभकामनाओं सहित !!!!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सचमुच ही बहुत शर्म की बात है. औसत से नीचे दर्जे के लोग जब भी देश पर अपने फैसले लादते हैं तो वो फैसले अधकचरे ही होते हैं.

आशीष कुमार 'अंशु' said...

Shrmnaak...

सचिन मिश्रा said...

Behad sarmnak hai.

Anonymous said...

Ek hindi patrakar ke roop me vidhi ayog ka yah nirnay mujhe khood ko joote marne jaisa lagaa tha. apko bahut badhai ki aapne is mudde ko itni sanjidagi se uthaya.

Pramod Pandey
Muzaffarpur (Bihar)

विनय said...

मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
मेरे तकनीकि ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं

-----नयी प्रविष्टि
आपके ब्लॉग का अपना SMS चैनल बनायें
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

बिल्कुल सही सवाल उठाए हैं बंधू आपने. लेकिन हमारी कोशिश यह होनी चाहिए की इन सवालों को सिर्फ़ अपने तक यानि ब्लॉग और साहित्यकारों तक सीमित न रखकर जनता की आवाज बनाएं. किसी तरह इस अंग्रेजीदां तंत्र पर दबाव बनाएं. सोचिए की इस दिशा में कैसे क्या हो सकता है?

बालसुब्रमण्यम said...

आपका यह आक्रोश वाजिब है।

मामला अब राजनीतिक हो गया है, और बहुत-से लोगों का स्वार्थ विधि महकमे में अंग्रेजी को बनाए रखने के साथ जुड़ चुका है।

स्थिति को हिंदी के पक्ष में पलटने के लिए मोर्चा राजनीतिक मंच पर ही चलाना होगा। अभी ऐसी कोई पार्टी मैदान में नहीं है जिसे पूर्णतः हिंदी-समर्थक पार्टी कहा जा सके, यहां तक कि यूपी-बिहार आदि हिंदी क्षेत्र की पार्टियां भी नहीं, जैसे समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, लोक दल आदि।

हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों को समझाना चाहिए कि शिक्षण, प्रशासन, न्यायालय, व्यवसाय आदि में हिंदी को चलाना उनके लिए जन्म-मरण का मामला है, और इसे कसौटी बनाते हुए उन्हें राजनीतिक दलों को आंकना चाहिए, कि ये पार्टियां इन मामलों में कहां स्थित हैं, और इसी विश्लेषण के आधार पर उन्हें वोट देना चाहिए।

इससे भी अच्छा तो यह होगा, कि हिंदीभाषी एक जुट होकर अपना खुद का कोई हिंदी दल बनाकर चुनाव लड़ें। यह दल अपने घोषणापत्र में ही अपने हिंदी समर्थक नीतियों का खुलासा करेगा, जैसे सभी शिक्षण संस्थाओं में, आईआईटी-आईआईएम से लेकर नर्सरी-किंटरगार्टन तक, शिक्षण माध्यम हिंदी करना, सरकारी कामकाज हिंदी में करना, न्यायालय का कामकाज हिंदी में करना, गांव-गांव में पुस्तकालयों का नेटवर्क बिछाना, पांच साल के अंदर सर्वसाक्षरता लाना, इत्यादि।

यदि यह दल विधान सभा-लोक सभा में दस-पांच सीटें भी जीत ले, तो आजकल के कोलिशन सरकारों में वह बहुत कुछ इन्फ्लुएन्स दिखा सकता है।

यह पार्टी बिलकुल निस्वार्थ रूप से हिंदी के हित में काम करेगी। इसके लिए समर्पित कार्यकर्ता चाहिए होंगे। जो लोग अपने-आपको हिंदी प्रेमी-हिंदी सेवी बाताते हैं, उनके लिए यह सुनहरा मौका है कि वे मैदान में उतरकर यह साबित करें कि वे मात्र बोलनेवाले हिंदी प्रेमी नहीं हैं, बल्कि करनेवाले हिंदी प्रेमी भी हैं।

यदि उन्हें इस दिशा में कोई मार्ग-दर्शन चाहिए, तो डा. रामविलास शर्मा ने अपनी विपुल रचनाओं में हिंदी की स्थिति के हर पहलू का विशद विवेचन किया है और बहुत ही ठोस और कारगर समाधान सुझाए हैं। देखें उनकी पुस्कतें, भाषा और समाज, और भारत की भाषा समस्या, दोनों राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हैं।

ताज्जुब की बात यही है ये पुस्तकें 1965 में ही लिखी जा चुकी हैं, फिर भी हिंदी भाषी लोग हिंदी को लेकर अब भी राह टटोल रहे हैं। लगता है, हिंदी भाषी लोग अपने ही साहित्य और साहित्यकारों के विचारों से अपरिचित हैं।

सबसे पहले इस अज्ञान को दूर करने की ओर प्रयास करना चाहिए।