16 October, 2008

हिन्दी और स्वभाषा पर विचारोत्तेजक लेख

भारत के मैकाले-पूजकों ने हिन्दी , राजभाषा , मातृभाषा आदि के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियां फैला दी हैं . इससे आम जनता के मानस पटल पर इनके महत्व की विराट छवि बनने ही नहीं पातीइसी का परिणाम है कि राजनैतिक रूप से 'स्वतंत्र' होने के बावजूद भी किसी को यह स्पष्ट ही नहीं है कि स्व-तंत्र होता क्या है और इसका क्या महत्व है? इसस भ्रान्ति से उपजे भटकाव के सहारे भारत में गुलाम मानसिकता से ग्रस्त एक अत्यंत छोटा सा समूह अपने साथ अन्य लोगों को भी गुलाम ने रहने को विवश किए हुए है

अंतरजाल पर हिन्दी , मातृभाषा एवं राजभाषा के महत्व को प्रतिपादित करने वाले लेख यत्र-तत्र विद्यमान हैंइस विषय के महत्व के देखते हुए इससे सम्बंधित लेखों की कड़ियों संकलित किया गया है जिसे और भी आगे बढाया जायेगाआशा है इन लेखों का एकत्रीकरण अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल होगा



14 comments:

जितेन्द़ भगत said...

informative post. thanx

Sanjeev said...

सराहनीय प्रयास है।

DHAROHAR said...

October mein bhi Hindi ko yaad karna aapki gambhirta ko dikhata hai. Regards aur swagat mere blog par bhi.

Rajesh Shrivastava said...

hindi ko lokpriya banane ki disha main apka prayas sarahniya hai.blog par achhe lekhon ka sanklan hai.

I said...

thanks so much , I have added this blog to my feed !

Keep up the good work

Dhanyawaad.

-ashutosh

योगेन्द्र जोशी said...

अनुनाद्जी,
अपने प्रयास में आप सफल हों यह कामना तो है ही, पर मैं समझ नहीं पाता कि इतना सब करने-कहने का क्या कहीं कोई असर होता होगा ? मैं स्वयं एक ब्लाग लिख रहा हूं आजकल, महज इसलिये कि मन में कई विचार आते हैं, लगता है लिख डालूं । लेकिन साथ में यह ध्यान रहता है कि पढ़ने वाला, अगर कोई हो तो, कुछ-कुछ मेरी तरह सोचने वाला होगा पहले से ही । उस व्यक्ति में बदलाव का तब कोई अर्थ नहीं रह जाता । और जिस तक विचार वस्तुतः पहुंचने चहिये वह नजर तक डालना नहीं चाहेगा । घूम फिर कर मैं देखता हूं स्थिति जस की तस बनी रहनी है । अस्तु, अपने पास वक्त है, इसलिये यही ! - योगेन्द्र (hinditathaakuchhaur.wordpress.com)

अशोक पाण्डेय said...

हिन्‍दी के उत्‍थान के लिए आपके प्रयास सराहनीय ही नहीं, प्रेरणादायक भी हैं।
****** परिजनों व सभी इष्ट-मित्रों समेत आपको प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां लक्ष्‍मी से प्रार्थना होनी चाहिए कि हिन्‍दी पर भी कुछ कृपा करें.. इसकी गुलामी दूर हो.. यह स्‍वाधीन बने, सश‍क्‍त बने.. तब शायद हिन्‍दी चिट्ठे भी आय का माध्‍यम बन सकें.. :) ******

PN Subramanian said...

अच्छा संकलन पाठकों के लिए एक साथ उपलब्ध कराया है. आभार.
http://mallar.wordpress.com

sanatansanskrit said...

अनुनाद सिंह एक रुचिकर नाम है। अच्छा नाम है- पूरा भरतीय दर्शन समाहित है इसमें विशेष रूप से वाक् एवम् तन्त्र के सन्दर्भ में।विचारों के सन्दर्भ में आपसे विमर्श करूँगा।

Sandeep Poriya said...

सर आपक प्रयास बहुत ही सही है। आप·क प्रयास से हमे गति मिली है। क्या आप हमारी एक गणेशा फांट ·क कनर्वटर करने क विधि बता सकते हैं

कविता वाचक्नवी said...

आपका हिन्दी के नेट संसाधनों के क्षेत्र में योगदान तो सर्वविदित है, उसके लिए बधाई अथवा धन्यवाद क्या और कैसे दिया जा सकता है!
आपके कन्वर्टर अपने समूह हिन्दी भारत में स्थाई प्रयोग के लिए स्थापित किए हुए हैं और समूह के लोग उनका लाभ लेते हैं। धन्यवाद। यदि आप स्वयं समूह से जुड़ेंगे तो मुझे हर्ष होना स्वाभाविक है, साथ ही आपका तकनीकी सहयोग का सीधा लाभ भी समूह को मिल सकता है

हाँ, इस संकलन में जोड़ने के लिए आभारी हूँ।

कविता वाचक्नवी said...

समूह का पता छूट गया था-
http://groups.yahoo.com/group/HINDI-BHARAT/

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

अनुनाद्जी,
अपने प्रयास में आप सफल हों यह कामना है!!!
हिन्‍दी के उत्‍थान के लिए आपके प्रयास प्रेरणादायक हैं। अच्छा संकलन!!!!

सुरेश शुक्ला said...

अनुनाद जी,

आपके प्रयासों की जितनी तारीफ की जाए कम है।
शेर का इलाका पेड़ों पर छोड़े निशानों से पता चलता है। मैंने आपके निशान - विकिपीडिया, technical-hindi पर देखे थें। आज हिन्दी लेख पढ़ते हुए यहाँ तक आ पहुँचा।

हिन्दी को सुद्ढ़ करने का कार्य समाज सेवा ही है।

भगवान आपको सफलता दे,
सुरेश शुक्ल